Monday, 12 December 2022

क्षांति पारमिता

 क्षांति पारमिता 

शांति प्रिय सज्जनो सन्नारियों,

आओ, आज क्षान्ति पारमिता के बारे में विमर्श करें। भगवान गौतम बुद्ध ने अपने जीवन में सनातन-शाश्वत धर्म का स्वयं साक्षात्कार किया एवं उसको जनता में निस्वार्थ रूपसे मुक्त हस्त बांटा। उन्होंने निर्वाण प्राप्ति के मार्ग को भी सहज-सुलभ पद्धति से सुआख्यात किया।  उस लोकोत्तरीय अवस्था को प्राप्त करने की लिए मनुष्य को दस परम अवस्थाओंको परिपुर्ण रुप प्राप्त करना होता है।इन्हे  बुद्ध वाणी में पारमिताएँ कहते है. ये दस पारमिताएँ  निम्न प्रकार की होती है: १: दान , २:शील, ३: निष्क्रमण, ४:प्रज्ञा, ५: वीर्य, ६:क्षान्ति, ७:सत्य, ८:अधिष्ठान, ९: मैत्री, १०: उपेक्षा (सन्दर्भ :१ )। एक महत्वपूर्ण यह बात है, की इन दसों में कहीं 'श्रद्धा' नहीं है। जब की श्रद्धा पांच बलों मैं प्रथम है (सन्दर्भ :१ )। लेकिन श्रद्धा धर्म के विविध रूप में अंतर्निहित है और दिखाई दे रही है।  उदाहरणार्थ बिना श्रद्धा के कोई दान और शील पालन नहीं कर सकता ।  

श्रद्धावान साधक इनकी परिपुर्ण प्राप्ति से दस संयोजनों से स्थायी रूप से मुक्त हो जाता है, अर्थात अपनी दुःखोंसे मुक्ति पाता है। उस अनुपम  लोकोत्तर और इन्द्रियों से परे कि  नितांत मुक्त अवस्था को प्राप्त करता है जो शाश्वत है, ध्रुव है। इसिलिये धर्म की इन विविध  विषयों/पारमितांको को (एक ही कालखंड में अनेक विषयों का अभ्यास जैसे की दसवीं की कक्षा) या फिर एक कालखंड में एक ही विषय/पारमिता का अभ्यास अनेक जन्मों में करता है !! इन दस विषयों की अर्जित पद्धति दोनों में से चाहे जो भी हो, इन सभी विषयों में  १००% गुण प्राप्ति होने पर ही नितांत मुक्त, अर्हन्त अवस्था प्राप्त की जाती है. तो वह साधक श्रावक बुद्ध याने अर्हन्त बन पाता  है। इन १००%  गुणों की लक्ष प्राप्ति करते करते न जाने कितने जन्मों का अवधि लग सकता है। लेकिन निर्वाणिक अवस्था का पहला स्टेशन (स्रोतापन्न) पा  लेने के बाद साधक अधिक से अधिक सातवें जन्म में निर्वाण प्राप्त कर लेता है।   (सन्दर्भ :२  )


बुद्ध तीन प्रकार के होते है।  सम्यक संबुद्ध , प्रत्येक बुद्ध और श्रावक बुद्ध। संबुद्ध वह  होते है जो धर्म की शिक्षा और दुःखमुक्तिदायिनी विद्या का स्वयं अनुसन्धान करते है और स्वयं नितांत मुक्त अवस्था प्राप्त करते है।  इसदृष्टि से वें आत्मनिर्भर होते  है। संबुद्ध दो प्रकार के होते है: सम्यक संबुद्ध और प्रत्येक बुद्ध ! सम्यक संबुद्ध होने के लिए अनेक जन्मों में  ( दसों परमिताओंकी पुर्ति की यात्रा), हर दस पारमिताओं का सर्वोच्च अभ्यास करना होता है।  और हर  जन्म में वो अपने साथ औरों की मुक्ति का भी यथोचित प्रयास करते है।  इसीलिए परहितकारी होने के कारन सम्यक(परिपुर्ण ) रूप से संबुद्ध होते है। 

जब की प्रत्येक बुद्ध, दस पारमिताओं की पुर्ति की यात्रा में किन्ही कारणोंसे औरों की मुक्ति में सहायक नहीं होते।  अर्थात उन्होंने स्वतः सम्बोधि भले ही प्राप्त की हो, परंतु किसी अन्य मनुष्य को धर्म नहीं सिखा सकता।  इसीलिए प्रत्येक यानि एकाकी संबुद्ध बनते है। इस संबोधि (स्वयं प्राप्त की हुयी बोधि ) प्राप्ति की यात्रा में उनकों (सम्यक बुद्ध और प्रत्येक बुध्द)  अनगिनत जन्मों में भव संसरण करना होता है। पारमिताओं की पुर्णता करते हुए उन्हे जितने   जन्म लेने पड़ते है, उन-उन जन्मों में उसको बोधिसत्व (जो आगे जाकर संबुद्ध बनेगा) कहते है। सम्यक संबुद्ध बनने के लिए , दस पारमिताओं का अभ्यास व उपलब्धि श्रावक या प्रत्येक  बुद्ध  की तुलना से गंभीर एवं त्रिस्तरीय होती है।

श्रावक बुद्ध वह है जिसने सम्यक संबुद्ध से धर्म और धर्म प्राप्ति की विधि (विपश्यना) सीखी/सुनी और दस पारमिताओंसे दस संयोजनों से मुक्ति पायी ।  श्रावक बुद्ध सम्यक संबुद्ध पर निर्भर होते है, क्योंकि सम्यक संबुद्ध से उन्हें धर्मज्ञान/मुक्तिमार्ग की प्राप्ती होती है  . 



सम्यक संबुद्ध  बनने की अनगिनत जन्मों की यात्रा में दस पारमिताओं की पुर्णता या सघनता  (१०० गुण ) के लिए अपने सांसारिक धन-संपदा, वैभव-ऐश्वर्य, प्रभुत्व-सत्ता है  नहीं बल्कि अपने किन्ही किन्ही अंगो का भी परित्याग करना पड़ता है।  इस ऐहिक (भौतिक व अल्प शारीरिक) परित्याग से दस मुल पारमिताएं के साथ दस उप-पारमिताएं जुड़ जाती है। 

इस से भी आगे सम्यक संबुद्ध  बनने के लिए, किसी और की मुक्ति में सहायता करते हुए दस परमिताओं को पुरा करने के लिए जब बोधिसत्व अपने पुरे जीवन का भी त्याग करते है, तब नयी और दस परमार्थ पारमिताओं को अर्जित करते है।  इससे बोधिसत्व अपने सम्यक संबोधि की दिशा में १०० गुण पाता है।  फिर उनका अगला जन्म सम्यक संबुद्ध के साथ अंतिम जन्म सिद्ध होता है।  

दस परमार्थ  पारमिताओंके को समझाने के लिए एक उदहारण देता हुँ।  सन १९६३ में व्हिएतनाम मे उस समय की सरकार बड़ी अन्यायी, क्रुर और पक्षपाती थी। अन्य बुद्ध शिष्य और बुद्धवाणी की सुरक्षा उस समय की सरकार से सहकार्य की अपेक्षा में जब सारे उपाय निरर्थक साबित हुए तब वरिष्ठ बुद्ध भिक्षु थिच कुआन डक  ने वीर्य पारमिता से उद्योग कर के  अपने जीवन का दान दिया।  उन्होंने यह अधिष्ठान लिया के, "जब तक में में जीवित हुँ तब तक इस अग्नि के दाह से ना तो मैं अपना आसन छोड़ुंगा, ना हीं चिल्लाऊंगा और न ही थोड़ी सी भी हलन-चलन करूँगा" ।  मृत्युपुर्व उन्होंने अपने अंतिम पत्र में देश के उस समय के अन्यायी अध्यक्ष को मैत्री-करुणा पूर्वक सभी देशवासियों और सम्प्रदायों के प्रति स्नेह-सद्भावना रखने का विनम्रतापुर्वक आवाहन किया।  जीवन त्यागने के पुर्व उन्होंने अनेक वर्ष, सभी अन्यायों का धीरज और साहस के साथ (क्षांति पारमिता से )सामना किया और सरकारी   अधिकारीयों से धर्मपुर्वक संघर्ष किया। उनके बलिदान के बाद भी अनेक भिक्षुओंने भी सरकार को मनाने के लिए जीवनदान दिया ।  इस महान त्यागों के परिणाम स्वरुप ही देश में समता और भाईचारे की शुरुआत हुयी।  (सन्दर्भ :३   )। 


आत्मदहन करते हुए भिक्षु थिच कुआन डक की अंतिम तस्वीर 

किसी बोधिसत्व का एसा पारमिता पुर्वक परमार्थ कल्याणकारी त्याग बड़ा ही दुर्लभ होता है।  इसिलए कहा जाता सम्यक संबुद्ध का उत्पन्न होना एक अत्यंत दुर्लभ और महामंगलदायी घटना है।  कोई भी व्यक्ति इन तिस पारमिताओंको प्राप्त करके ही सम्यक संबुद्ध बनता है।  श्रावक बुद्ध बनने  के लिए केवल पहले की दस पारमिताएं ही पर्याप्त है।  (सन्दर्भ :१ )


दानादि धम्म विधिना जितवा मुनिन्दो ..,

हम देखते है की सिद्धार्थ गौतम ने जब मार को अकेले ही पराजित किया, तो कहा गया कि दान और अन्य पारमिताओं के बल से ही उन्होंने यह विजय प्राप्त की (सन्दर्भ :४  )। 


मेरे विचार से, अर्हंत/संबोधि फल के लिए निश्चित रुप से ही सभी दस पारमिताएं अनिवार्य हो लेकिन, जब बात आती है आसपास के धर्मप्रेमी मनुष्यों को प्रेरणा, धैर्य और ध्येय देने की लिए कल्याणमित्र /गुरुबंधु को सत्य, शील, क्षांति एवं मैत्री ये चार बहोत ही महत्वपुर्ण पारमिताएं  है। आटानाटिय सुत्त में इस का उद्घोष इस प्रकार से है(सन्दर्भ :५ )।  :

तेसं सच्चेन सीलेन, खन्ति  मेत्ता बलेनच, 

तेपि त्वं अनुरक्खन्तु, अरोगेन सुखेनच || 


विपश्यना सीखने कि बाद जैसा की पुज्य गुरुदेवजी ने कहा, हमें स्मृती और संप्रज्ञान को दिनरात अभ्यास करना होता है। सैंतीस बोधिपक्षीय धर्मों (सन्दर्भ :६ ) में 'स्मृति' पारमिता स्पष्ट-अस्पष्ट रूप से ११ बार कही गई है।  तो में उसी का अभ्यास ज्यादा करता था।  लेकिन अपने आप की चित्त वृत्तियों को समझने के बाद मैंने हाल ही में 'क्षांति' पारमिता पर अधिक जोर दे रहा हुँ। ये ठीक उसी तरह है की जैसे, घर का एक कमरा रोज  साफ करते करते, अन्य कमरे के ऊपर उचित ध्यान न गया हो, तो अब उस कमरे की सफाई शुरु कर दी है ।  

इसीलिए इस लेख मे मेंने क्षांति पारमिता पर विचार संदर्भसहित सामने रखता हुँ। क्षांति पारमिता का सही अर्थ किसी एक हिंदी शब्द के आधार पर नहीं कहा जा सकता। आचार्य गोयन्काजीने बुद्ध जीवनी जे अनेक प्रसंगो को उजागर किया है।  गुरूजी के अनुसार क्षांति का सही अर्थ: अमर्याद और मंगलमयी धैर्य,  चित्त की दृढ़ता, संयम (जिसमें उद्यमता हो) और सहिष्णुता बताया है। ये चारों गुणों का संगम हो जाये तो क्षांति पारमिता की सही संज्ञा बन सकती है। क्षांति पारमिता से मैं यह समझ सकता हुँ के मनचाही न होने और अनचाही होने पर, धीरज रखना चाहिए, आनेवाले समय में स्थिति में सुधर होगा (सकरात्मता-आशावाद) । और यदि किसी हालत में सुधर न भी हुआ , तो भी मन में सारे प्राणियों के प्रति सद्भावना बनी रहनी चाहिए, शील नहीं छुटना चाहिए और नहीं मन में अकुशल भावनाउत्पन्न होनी चाहिए।  तो ही क्षांति पारमिता पुरी होगी। तो आओ उन प्रसंगो को देखे और उनसे क्षांति-धर्म सीखें जो मुझे प्रेरणा देते है। 

१. पहला प्रसंग :  अनेक लोगों की जान बचाने के लिए जब तथागत ऐसे सुने घर गए जहा दुर्दम्य और विक्राल  यक्ष आळवक  रहता था। आळवक पर घर पर नहीं था तो भगवान ने  घर में उचित स्थान पर ध्यानस्थ हुए। आळवक क्रोध के मारे ने उन्हें अपमानित करके उन्हें घर से निकलने को कहा।  भगवान ने कहा ' आयुषमान , ठीक है। " और बाहर चल दिए। उनके जाने के बाद तुरंत कहा , "श्रमणा, अंदर आ जाओ" तो भगवान ने "ठीक है। " कहकर पुनः भीतर आये।  यही किस्सा ठीक  तीन बार हुआ, जैसे पुनः प्रसारित हुआ हो।  तब भगवान ने दृढ़ निश्चयसे से कहा, "मैं अब नहीं जाऊंगा तुम्हे जो ठीक लगे सो करो।" ऐसा कहने पर आळवकने। उन्हें  क्रूरतापुर्वक हत्या की धमकी देने पर भी अपने निश्चय से नहीं हटे।  उनका ध्येय कल्याणमित्रता हिमालय की भांति ऊँचा और  भाँति विशुद्ध था। फिर  क्षांतिपुर्वक उन्होंने क्रोधी लेकिन विद्वान आळवक के प्रश्नों के उत्तर अपनी समताभरे चित्त से दिए (सन्दर्भ :७  ) ।  यह प्रसंग उच्च दर्जे का धैर्य, चित्त की दृढ़ता, संयम और सहिष्णुता बताता है। 

२ .दुसरा  प्रसंग :  जन्म से सुखवस्तु घर में पला बड़े सिद्धार्थ गौतम का आदर तो हो ही रहा था।  पर उनके मैत्रीपुर्ण व्यवहार और प्रभावी व्यक्तिमत्व के कारण लोग उन्हें बहुत प्रेम-स्नेह भी बहुत देते थे। अगर ऐसा जीवन व्यतीत हुआ हो और थोड़ा भी उपमर्द या अनुचित व्यवहार हो तो व्यक्ति के उद्विग्नता का क्या कहना?  क्रोध और उद्विग्नता का  कारण  भी तो है, "अमुक ने मेरा अपमान  किया!" . इससे भी बड़ा घातक अपमान ऐसे व्यक्ति का हुआ जिसे राजा-प्रजा ही नहीं बल्कि समस्त देवलोक भी दिनरात पुजते है।  

ऐसे एक प्रसंग में , अग्गिक भारद्वाज ब्राह्मण ने तथागत को कहा , "आगे न बढ़...वहीं रुक जा ए बहिष्कृत, ए  मुण्डक! मेरा यज्ञ ख़राब मत कर!" ऐसे दुत्कारने पर भी क्षांति पारमिता के कारण भगवान ऐसे अपमान को सह सके. मंगल मैत्री देते हुए उन्होंने कहा (सारांश) की बहिष्कृत/वृषल  किसे कहते  है।  फिर कहा  , "हे ब्राह्मण, जन्म से ना कोई बहिष्कृत होता है न जन्म से कोई ब्राह्मण! कर्म से ही कोई बहिष्कृत होता है और कर्म से ही कोई ब्राह्मण।"

कुछ ऐसा ही प्रसंग अक्कोस भारद्वाज के साथ हुआ, क्षांतियुक्त सुदान्त चित्त से भगवान ने उसमें धर्म जगाया।  जो किसी व्यक्ति से भी और किसी प्रकार से भी क्रोधित नहीं किया जा सकता और जो दूसरोंको भी क्रोधित नहीं करता, उसी व्यक्ति लोग मुनी कहते है (सन्दर्भ :९  ) ।  


३ .तिसरा प्रसंग:  आचार्य उरुवेल कश्यप और उनके बंधुओंके अनेक अनुयायी भगवान से बहुत क्रुद्ध हुए थे, क्योंकि वे सब भगवान के अनुयायी बन चुके थें।  तो ऐसे अंध भक्तो से अनेको बार भिक्षुओंको गाली, दूषण या विविध लांछनो को भी दिनरात सामना करना पड़ता था ।  अगर ऐसे अप्रिय स्थिति कुछ घंटो या दिनों में निश्चित रूप से समाप्त होनेवाली है इसकी जानकारी हो, तो आदमी उसको दिन गिनते-गिनते सहन भी कर सकते है । लेकिन अगर मालुम ही न हो, की ये बहिष्कृतता कब समाप्त होगा तब सच्ची परीक्षा (अमर्याद धैर्य) होती  है।  जैसे अशुद्ध सोने को मालुम नहीं होता की सुनार कितने समय तक मुझे भयंकर भट्टी  में तपाने वाला है। तो धैर्य,साहस और संयम  के अभ्यास भी कोई निश्चित सीमा नहीं, क्योंकि सब अनिश्चित ही तो है।  ऐसा तप और क्षांति पारमिता का सामर्थ्य बुद्धपुत्र भिक्षु कोलित (मोग्गालन) और भिक्षु उपतिष्य (सारिपुत्त) ने दिखाया जो अभी तक अरहंत नहीं बने थे।  

४ .चौथा प्रसंग : तथागतने अनेक प्रेरणादायी और गंभीर प्रसंगोंमें क्षांति पारमिता का दर्शन अपने आचरण द्वारा दिया है।  अनुपम शास्ता है तो उनके शासन में प्रवीण अनेक गृहस्थ साधक-साधिकाओंए ने भी अनिच्छित, अवांछित अप्रिय प्रसंगों में क्षांति पारमिता दर्शित होती है।  

ऐसा ही विपश्यी शिष्य राजा बिंबिसार! जिसने अपने पुत्र को जो संपुर्ण सत्ताप्राप्ती के लिए अंध हो कर अपने ही सत्ता-निवृत्त हुए पिता बिंबिसार कि हत्या करने चला था।  उसी को बिंबिसार ने विकसित क्षांति पारमिता से वात्सल्यभाव दिखाकर केवल माफ़ ही नहीं किया बल्कि मन में किसी बात का द्वेष भी नहीं रखा। अंत में अपने पिता को कैदी बना कर तड़पा-तड़पा कर मरवा दिया।  अंत तक बिंबिसार ने क्षांति (अमर्याद धैर्य-धीरज) के आधार पर न उसके बार में क्रोध जगाया न अपने को व्याकुल बनाया।  इस स्वाभाविक नकारात्मक मनोस्थिति के विपरीत उसका ह्रदय अपने पुत्र के प्रति सदा करुणा से भरा रहा! चित्त से मंगल मैत्री ही निकलती रही!

फुट्ठस्स लोकधम्मेहि, चित्तं यस्स न कम्पति।
असोकं विरजं खेमं, एतं मङ्गलमुत्तमं॥11॥ (सन्दर्भ :१०   )

जिसका चित्त आठ लोकधर्मों ((लाभ-हानि, यश-अपयश, निंदा-प्रशंसा, सुख-दुख)  के संपर्क से प्रकंपित नहीं होता, जो अशोक, निर्मल एवं निर्भय रहता यह उत्तम मंगल है। 

मैंने जाने-अंजाने में अनेकोबर मेरे बच्चों और पत्नी को व्याकुल-क्रुद्ध हो कर डांटा है। ऑफिस/समाज में कुछ एक घटना  हुयी तो उसी चिंतन से और नकारात्मक स्थिती का चिंतन कर के मैं वो स्नेह व आदर नहीं दे सका जिसके वें हक़दार है।  इस सप्ताह की दो घटनाएं बताता हुँ जिन से मैंने अपने आप को क्षांति पारमिता से संभाल लिया।  

प्रसंग १ : मैंने बच्चों के लिए ऑफिस से आधे दिन का आवेदन चढ़ा कर छुट्टी लेली।  बॉस ने सन्देश भेजा, "कितनी छुट्टियां ले रहे हो?  पहले क्यों नहीं बताते? अभी जाओ,अगले दिन  को बात करेंगे। " मैंने हमेशां की तरह तर्क-वितर्क करना शुरु कर दिया।  अब क्या होगा? बॉस कितना डांटेगा? भला बुरा कहेगा? प्रायः ऐसी भय में अपना भय पत्नी को बताता हूँ जो मेरा सहस बढाती है।  इस बार उसे न बता कर, मैंने अनित्यबोध के साथ अमर्याद ध्येय और चित्त की दृढ़ता कायम रखने का काम शुरु कर दिया।  ५% धर्म विचारोंने ९५% अकुशल विचारोंको पराजित कर दिया।  क्षांति पारमिता से मैंने अपने पत्नी और बच्चों को न केवल डाँटा बल्कि स्नेहपुर्ण व्यवहार भी किया।  यह मेरे लिए अद्भुत और चमत्कारपुर्ण था।  

प्रसंग २ : मेरा बेटा  दसवीं कक्षा में होने पर भी, बड़ा बीमार, आलसी और अनुत्साही होकर अनुशासनहीन और गैरजिम्मेदारीपुर्ण व्यवहार करता है।  मैं उसे प्रायः डांटता हुँ और बहुत बार कटुता का प्रभाव दिखता है। इससे कोई लाभ नहीं होता, उससे उसका आत्मविश्वास और कम हो जाता है।  मैं इसे भी खुब जानता हुँ की वो मुझसे बहुत ही प्यार-आदर करता है।  पर फिर भी बात सही दिशा में नहीं जा रही है।  पर मेरी व्याकुलता और उसके प्रति रुक्षता बढ़ रही है। आज उसको मैंने क्षांति पारमिता (हम नहीं जानते यश मिलेगा भी या नहीं, पर अमर्याद धैर्य रख कर अनित्यबोध जगाया)  से समझाया तो देखा, भले ही वो समझा हो या नहीं समझा वो बात अलग।  लेकिन मैंने उसे समझाते समय, मन में कटुता या कठोरता नहीं आने दी (या बहुत की कम थी) और ना ही उस के प्रति अनादर रखा। उसे क्षांति पूर्वक प्रेमभरे शब्दोंसे कुछ प्रश्न पुछे जिससे उसकी मनोभावों का मुझे अंदाजा हो। मैंने प्रयत्न तो किया, पर समताभाव था।  भाविष्य में पुत्र द्वारा आनेवाले भय से मैंने कुछ काल के लिए ही सही छुटाकारा पा लिया। उसका पता नहीं, पर मेरा तो कल्याण हुआ क्योंकि क्षांति पारमिता के कारन में मेरी व्याकुलतासे बच पाया ।  उसका भी भला हो ऐसी मंगल कामना बिना चिंता/भय के साथ जगी।  यह तो पहले कभी नहीं हुआ था। 

प्रसंग ३  : आज का ही किस्सा है।  ऑफिस में आसपास के लोगों की आलास, कुटनीति और छलकपट से बहुत ही व्याकुल रहता हूं।  कुछ दिनों पहले ऐसे ही लोगों को मैंने अपने बॉस के सामने खुब डांटा।  बॉसने मुझें पप्यार से समझाया फिर भी मुझसे सहन न हुआ।  अभी इन्ही लोगों ने मेरे विरुद्ध के शिकायत की के, मैं बहुत ही डांट रहा हुँ।  इस बात के लिए बॉस ने मुझे दोष दिया और कई बार सुनाया भी। अब किसी का फोन आता है कीतो भय जागता है की बॉस उस या किसी नए कारण से डांटेगा या न जाने मेरी अच्छी प्रतिमा/छवि अवश्य ही बहुत मलिन हो गयी होगी।  और न जाने मेरी छवि कब सुधरेगी।  तो क्षांति पारमिता (अमर्याद धैर्य-चित्त की दृढ़ता) का अभ्यास विपश्यना भावना (स्मृति-संप्रज्ञान) से अनित्यबोध जगाता हो तो विकार मानस के स्टार पर आते आते निरुद्ध हो जाते है।  

आशा है क्षांति और अन्य पारमिताओं से जैसे मेरा थोड़ा सा कल्याण हो रहा है, वैसा औरों का भी हो। 

 

सबका मंगल हो !

संबोधन धम्मपथी 



सन्दर्भ :

१. त्रिपिटक में सम्यक सम्बुद्ध, भाग १ , पृष्ठ ७०  : 

२. त्रिपिटक में सम्यक सम्बुद्ध, भाग १ , पृष्ठ ७५ : सत्काय दृष्टी , विचिक्त्सा , शीलव्रत परामर्श, काम-छंद, प्रतिघ (अप्रिय के प्रति द्वेष), रुप-राग, अरुप-राग, अस्मिताभाव(अहंभाव ), औद्धत्य(बैचेनी), अविद्या  

३ . https://en.wikipedia.org/wiki/Th%C3%ADch_Qu%E1%BA%A3ng_%C4%90%E1%BB%A9c

४. जयमंगल अट्ठगाथा 

५ . आटानाटिय सुत्त , ३२ दीघ निकाय 

६. सैंतीस बोधिपक्षीय धर्म, डॉ. भदंत सावंगी मेघंकरजी

७. आळवक सुत्त, संयुक्त निकाय १.१० 

७. विशुद्धिमग्ग, भाग-१ , ४:पृथ्वी कसिण निर्देश 

९. मुनि सुत्त, सुत्त निपात - २१८  

१० . महामंगल सत्त,  संयुक्त निकाय २.४ 


Monday, 18 October 2021

धम्म चर्चा : उपासकाने भिक्षु चे पाय धुवावेत का?

प्रश्न: उपासकाने भिक्षु चे पाय धुवावेत का? ह्या फोटो प्रमाणे ?



 उत्तर:
बुद्धांनी उपासकाला भिक्षुचे पाय धुवायला सांगणे ही तर खुप दुर ची गोष्ट, बुद्धाने त्या काळातही अनावश्यक आदर/थाट, अनावश्यक खर्च व अनावश्यक सत्कार ही थांबवलेला होता. 

पहिली घटना:
तथागतांनी बोधिराजकुमाराने केलेला अनावश्यक खर्च व अनावश्यक सत्कार मौन राहुन नाकारला  

 कौशांबीचा‌ राजकुमाराने राजमहालात भगवंताला भिक्षु संघासहित बोलावले असताना, महालाच्या पायऱ्यावर भगवंतांच्या स्वागताठी पांढ-या शुभ्र पायघड्या घातल्या होत्या. अनेक वेळा महालात यायची विनंती करूनही भगवान तिथेच पायघड्याच्या बाजुला शांत उभे राहिले.  भिक्षु आनंद भगवंताचा आर्य-विनय / धर्म-विनय ओळखून होते, त्यांना याचे कारण कळाले.

तेव्हा भिक्षु आनंद म्हणाले, भावी काळातील जनतेला जमणार /पटणार नाही अशा रुढी भगवंताला ठेवायच्या नाही. ही भावी जनतेवर अनुकंपा(दया बुद्धी) आहे. तुम्ही राजकुमार आहात, जो खर्च तुम्हाला शक्य होईल ते इतर सामान्य माणसाला /गोर-गरीबाला पेलवणार नाही. त्या पायघड्या हटवल्या नंतरच तथागतांनी महालात प्रवेश केला. अशा प्रकारे भगवंताने त्या पायघड्या "अनावश्यक आदर" आहे, असे भिक्षु आनंदाद्वारे सांगुन काढायला सांगितल्या होत्या.


दुसरी घटना:
भगवतांनी परिनिर्वाणाची घोषणा केल्यावर अनेक भिक्षु भावुक होत  भगवंताची पुजा करू लागले. यावर  तथागतांनी प्रेमाने समजावले कि, फुले-हारांनी  बुद्ध पुजा ही तथागताला अभिप्रेत अशी नाही. बुद्ध म्हणाले माझी पुजा तशी होत नाही.

 ईमाय धम्मानुधम्म पटिपत्तिया बुद्धं पुजेमि!!

भाषांतर: ३६ बोधिपक्षिय अनुधम्म/उपधम्म यांचे उत्तम शिक्षण व पालन करीत, मी तथागतांना वंदन करीत आहे.. 

असेच मार्गदर्शन त्यांनी भिक्षू तिस्स च्या आचरणाकडे सुचना देत भिक्षूंना समजावले.
"जो माणुस धम्म-अनुधम्म/उपधम्म (म्हणजे पारमिता, बोध्यंग, स्मृती, सम्यक प्रधान इत्यादी ३६ बोधिपक्षिय अनुधम्म  यांचे उत्तम शिक्षण व पालन  करतो, तो‌ माझी पुजा करतो."
 संदर्भ: धम्मपद  अट्ठकथा २.१५५ तिस्सथेरवत्थु

तिसरी घटना: 




आरद्ध वीरिये पहितत्ते, निच्च मी दळ्हपरक्कमे।
समग्गे भालके पस्स, जतन बुद्धानवन्दनं।।

फुले हारांनी बुद्ध पुजा होत नसते. या श्रावकांना पाहा, जे समग्रपणे पराक्रम करीत (निरंतर विपश्यना ध्यान ) मनविशुद्ध करीत आहेत. तीच खरी वंदना.

 संदर्भ: थेरी अपदान २.२.१७१

चौथी घटना:



राजा प्रसेनजितला भगवंतांनी "धम्म काये"ला वंदन करण्यास सांगितले, "रूपकाये"ला नाही!!

वयाच्या ८०व्या वर्षी कोशलराजा भगवंतांना वंदन करताना त्यांच्या पायांचे चुंबन घेतले होते. त्यावर भगवतांनी त्यांना विचारले, "काय झाले महाराज? या शरीराविषयी एवढा आदर व असा विचित्र सन्मान का व्यक्त करीत आहात?" यावरून हे दिसते कि, भगवंताला असा आदर विचित्र व अनावश्यक वाटतो. महामानवाच्या गुणांना समजुन ते धारण करणे, हाच खरा आदर व सत्कार आहे; धर्म पालन करण्याबाबत बुद्धांची हि तीच अपेक्षा आहे. बाकीचे अवडंबर/कर्म-कांड  करण्यात काही लाभ नाही, उलट हानीच आहे.

धारण करें तो धरम हैं, वरना कोरी बात ।
सुरज उगे प्रभात है,  वरना काली रात ।।

(विपश्यना आचार्य गोयंकाजी ) 


बुद्धांनी अहंकार कमी करण्यासाठी अनेक नियम भिक्षु संघाला बुद्धाने आहेत. मागील लेखात धुतांगधारी महाकाश्यपपांबद्दल मी संगितलेलं आहे. 

उपासकांना पाय धुवायला सांगितल्याने भिक्षुंचा अहंकार वाढुन भिक्षुंची हानीच होईल. पाय धूवायला सांगणे हा तर भगवंताला अभिप्रेत असलेला बंधुभाव‌ही नाही आणि समाजसेवेची/कर्तव्याची भावना (........ बहुजन हिताय बहुजन सुखाय , लोकानुकंपाय) तर नाहीच नाही. खुपचं अशोभनीय व‌ दुर्दैवी आहे असे वर दिलेल्या ऐतेहासिक प्रसंगावरून स्पष्ट होते.

आजकाल आपल्याला त्रिपिटक आचार्य डॉ . धर्मरक्षित, महापंडित राहुल सांकृत्यायन, डॉ . जगदीश महाथेरो, महाथेरो आनंद कोशल्यायन अशा अभ्यासु, महापंडित व सेवाभावी भंतेची गरज असताना, असे पाय धुण्याची अपमानजनक किंवा अंधश्रद्धा वाढवणारी वागणुक देणारे भंतेजी दिसतात हे क्लेशदायक आहे. यावरून हे ही दिसते कि बुद्धवाणीचा पुरेसा अभ्यास नाही. मनोरंजनाचे साधने जरा कमी करत, समाजानेही बुद्ध वाणीचे वाचन केल्यास खूप फायदा होईल.

जो भिक्षू (सध्दर्मात) स्वतःला प्रेरित  करतो, आत्मपरीक्षण करतो, 
तो स्वतःची रक्षा स्वतःच करीत, स्मृतिमान भिक्षू (साधक) सुखपूर्वक विहार करील !!
संदर्भ : धम्मपद ३७९

भगवान बुद्ध आणि त्यांचा ऐतिहासिक संघ (भिक्षु-भिक्षुणी, उपासक-उपासिका) यांचे गुण आणि सामाजिक कर्तव्याचे भान  हे खुप प्रेरित करणारे व जीवनाला उभारी देणारे आहे. त्रिपिटकातील ऐतिहासिक सत्यकथांचा अभ्यास केला तर ते स्पष्ट होते. अशा कथा/गाथा हिंदीतही उपलब्ध आहेत. इथे क्लिक करा मज्झिम  निकाय   धम्मपद 

अभ्यासु व‌ समाजसेवी बुद्धांच्या संघाला वंदन करतो व अशी अशोभनीय वागणुक दिसणार नाही याची आशा करतो. 

संबोधन धम्मपथी
९७७३१००८८७

Wednesday, 30 June 2021

धम्मचर्चा : स्मृती-अनुस्मृती आणि धम्म-अनुधम्म यात काही फरक आहे की एकच आहेत

  उत्तर: 

अनु म्हणजे मुख्य विषयाचे उप-विषय, उपविभाग किंवा कप्पे  !!  




 उदाहरण : ईमाय धम्मा-नुधम्म(धम्म-अनुधम्म) पटिपत्तिया बुद्धं पुजेमि!!

 धम्म‌ आणि अनुधम्म:
 धम्म‌: शील, समाधि, प्रज्ञा
 अनुधम्म : ३६ बोधिपक्षिय उप-धम्म


 स्मृतीचे दोन अर्थ आहेत.
१. उजळणी/आठवण/memory
२. जागरुकता... awareness/mindfullness  

स्मृती म्हणजे एखाद्या विषयाची उजळणी/आठवण किंवा जागरुकता... awareness !

अनुस्मृती म्हणजे एखाद्या 
(विषयाच्या) स्मृतीच्या(इथे सजगता- सर्व उप-विषयांची विषयाची उजळणी/आठवण किंवा त्या उप-विषयांची जागरुकता... awareness!!!


धम्म अनुस्मृती म्हणजे, धम्माच्या sub-topic ची उजळणी!(अर्थ पहिला)

बुद्धानुस्मृती म्हणजे, बुद्धाच्या sub-topic ची उजळणी!(अर्थ पहिला)

नुसती "अनुस्मृती" (अर्थ दुसरा) म्हणजे स्मृती(विपश्यनेसाठी लागणारी स्मृती व संप्रज्ञान मधील *स्मृती* ) ‌च्या sub-topic (कायानुस्मृती, धम्मानुस्मृती, चित्तानुस्मृती, वेदनानुस्मृती) ची उजळणी!(अर्थ दुसरा)

भले होवो.
संबोधन धम्मपथी
9773100886
👍🙏

Saturday, 19 June 2021

दान करताना समज व गैरसमज

 प्रश्न १: साधारणतः मनुष्य दान का करतो ?


उत्तर : जेव्हा माणुस दान देतो, तेव्हा वरवर पाहताना असे दिसते पाहा किती परोपकारी व माणुसकीची जाण ठेवणारा माणुस आहे. पण अंतर्मनात स्वतःने पहिले तर कितीतरी वेळा माणसाचा स्वार्थ व भीती असल्याने मनुष्य दाणे देत असतो. आसपासच्या अनपेक्षित व नको असलेल्या खूप दुर्दैवी घटना नकळत घटत असतात. वाईट वाटते, भीती वाटते पण कारण कळत नाही. त्यामुळे मी बैचेन होतो. मी व माझे (आरोग्य, पैसे, ऐश्वर्य, बायको -मुले, परिवार व समाज) ठीक/सलामत  राहावा यासाठी माझ्या संप्रदायातील पूजापाठ करणारे व वाईट काम न करणारे माणसे असतात. 


त्यांना दान दिले तर माझी पापे कदाचित धुतली जातील व माझे (आरोग्य, पैसे, ऐश्वर्य, बायको -मुले, परिवार व समाज) सलामत राहतील अशी कल्पना व आशा करतो. एकूणच फक्त स्वतःच्या स्वार्थासाठी दान केल्याने ते दान परोपकारी ठरत नाही त्यामुळे त्याचे ते पुण्य मिळत नाही जे परहितबुद्धीने किंवा कल्याणकारी भावनेने मिळते. कारण दान देताना मनात बैचेनी आणि  स्वतःचा व स्वतःच्या संप्रदायाचा (हिंदु, मुस्लिम, बौद्ध, जैन, ख्रीश्चन) स्वार्थाची भावना प्रबळ होती. 

प्रश्न २: म्हणजे मनुष्य दान देताना निस्वार्थ भावना असली कि पुण्य मिळते. बरोबर ना?

उत्तर :जरुरी नाही. जसे एका शेतकऱ्याने नापीक जमिनीत खूप मेहनत-मशागत करत बीज पेरली तर त्याला अपेक्षित यश येणार नाही. कारण त्याने जमिनीच्या दर्जावरती अजिबात लक्ष दिलेले नाही किंवा त्याची त्याला पुरेशी माहिती नाही. 


तसेच जर दान स्वीकारणारा (हिंदु, मुस्लिम, बौद्ध, जैन, ख्रीश्चन इतर कोणीही असेना) जर शील पाळणारा सदाचारी नसेन, संयमी, मन विशुद्ध करणारा व लोकांना (हिंदु, मुस्लिम, बौद्ध, जैन, ख्रीश्चन इतर कोणीही असेना) मदत करणारा नसेल तर अशा अनाडी, आळशी किंवा ढोंगी माणसाला दिलेले दान जरी निस्वार्थ भावनेतुन असले तरी त्याच्या अपेक्षित तेवढा लाभ होत नाही. कारण दान स्वीकारणाऱ्याच्या नैतिक दर्जाबाबत (स्वशुद्धी व सामाजिक जबाबदारीबद्दल) दान देणारा सजग नसतो

प्रश्न ३: मग  बुद्धाने 'सब्ब दानं धम्मदानं जिनाती' असे स्वतःच्या संप्रदायालाच दान करायला का बरे सांगितले असावे?

उत्तर : बुद्धाने 'सब्ब दानं धम्मदानं जिनाती' (धम्मपद २४, ३५४) सांगितले जरूर आहे पण त्या अर्थाचा सध्या अर्थच बदलला आहे. 

पहिली महत्वाची गोष्ट अशी कि बुद्धाने  "तुम्ही एखाद्या शीलवान, कर्तव्यबुद्धी असलेला व इतरांना निस्वार्थपणे मदत करणाऱ्याचा संपूर्ण खात्री  केल्यावर आदर करावा भले तो कुठल्याही जात-संप्रदायाचा असो!" असे सांगितले आहे हे कायम लक्षात ठेवावे कारण बुद्ध वाणी हि सार्वजनिन आहे. सर्वाना लागू पडते व सर्वासाठी मंगलमय आहे. 

☸️ सध्याचा 'सब्ब दानं धम्मदानं जिनाती' प्रचलित चुकीचा अर्थ:

फक्त एका बौद्ध संप्रदायाचा प्रचार-प्रसारासाठी बौद्ध माणसांनाच(भिक्षु -भिक्षुणी, उपासक-उपासिका) दान‌ करत जा. त्यासाठी केलेली इतर वस्तुंचे दान‌( मुर्ती/पैसा/चीवर/भोजन/औषधे), अशा भौतिक वस्तुंचे दान बौद्ध संप्रदायातील लोंकासाठीच केलेले असते,ते जगातील इतर सर्व दाना‌पेक्षा‌ श्रेष्ठ आहे. ह्या दानाचा बुद्ध वाणी लोकांना सांगण्याशी स्पष्ट संबंध कोणाला ठेवण्याची गरजच‌ वाटत नाही.

हा समज व धोरण चुकीचे व सर्वस्वी अयोग्य आहे!! कारण दान करणारा हा दान स्वीकारणाऱ्या(भिक्षु-भिक्षुणीं-तज्ञ उपासक व तज्ञ उपसिकांकडुन) कडुन माझ्या, माझ्या परिवाराच्या किंवा सर्व  समाजाच्या मन विशुद्धीला आवश्यक असणाऱ्या बुद्धवाणीसाठी कुठल्याच प्रकारची योजना, परोपकाराची अपेक्षा ठेवताना दिसत नाही. 

तशी स्पष्ट अपेक्षा कोणाला ठेवण्याची गरजच‌ बरे वाटत नाही यांचे उत्तर वर प्रश्न #१ मध्ये दिलेलं आहे.

असे दान अंधश्रद्धा बनते कारण त्याने कोणाचे‌ व कुठल्या समाजाचे भले असे होईल असे दानकर्त्याला व दान स्वीकारणाराला सांगता यत नाही. 


तसेच दान स्वीकारणाराची पात्रता एवढीच कि तो बौद्ध संप्रदायाचा आहे!!! हि बुद्धाला अपेक्षित सार्वजनिनता व महाकारुणिकता दिसतच नाही.   


तो किती‌ शीलवान, विशुद्ध मनाचा, परहितबुद्धि जपणारा(धुतांगधारी)  व‌ अधिकृत बुद्धवाणी वाचुन ती सुयोग्य पद्धतीने मानव जातीला  (हिंदु, मुस्लिम, बौद्ध, जैन, ख्रीश्चन) देण्याचं कर्तव्ये करणारा असावा‌ अशी‌ कुठलीच अपेक्षा नसते. त्यामुळे बुद्धाच्या शिकवणुकीबाबत इथे गैरसमज झाल्याने सार्वजनिक बुद्धवाणीला इथे एका बौद्ध समाजापुरते ठेवण्याची मोठी चूक झाली आहे.  

☸️ प्रचलितचुकीच्या अर्थामुळे उद्भवलेली मोठी समस्या :

तुम्ही दान स्विकारुन खालील गोष्टी प्रामुख्याने कराव्यात असे दान देणारा सांगताना दिसत नाही :

१. त्रिपिटकात बुद्धाने केलेले मार्गदर्शन (कुटुंबाला, नेत्याला, कामगारांना, मालकाला, नोकरांना, पती -पत्नींना, मुलांना) वाचुन आम्हास शिकवावे. (म्हणजे परियत्ती)

२.  विपश्यना: ध्यान साधना विधी  समाजाला शिकवण्यासाठी स्वतः विपश्यना साधनेत प्रवीण/एक्सपर्ट होऊन. सद्गुण जीवनात आणण्यासाठी समाजाला जागे करावे. (म्हणजे पटीपत्ती )

जर दान कर्त्याने अशी अपेक्षाच नाहो ठेवली तर दान स्वीकारणारा सुस्तावतो, आळसावतो व जीवनाला बुद्धाने सांगितलेला उद्देश्य नसल्याने (अधिकाधीक लोंकाच्या हित व सुखासाठी दिवस रात्र मेहनत करा - बहुजन हिताय बहुजन सुखाय ) खालील गोष्टी वाया घालवतो :

१. दान देणाऱ्याचा पैसे वाया जातात (कारण पैसे घेऊन कल्याणकारी काम करत  नाही) आणि त्यामुळे त्याला पुण्यही मिळत नाही.  

२. स्वतःचे जीवन निरर्थक किंवा थोतांड बनते

३. बुद्धाच्या महान धम्माची व संघाची अवनती (वाट लावतो)

☸️ 'सब्ब दानं धम्मदानं जिनाती' चा खरा अर्थ:

धम्म (बुद्धवाणी-म्हणजे शील समाधि प्रज्ञेला अनुसरुन असलेले ३७ बोधिपक्षिय धर्माविषयी निस्वार्थ व परहितबुद्धीने  बुद्धी ने केलेले लेखन/मार्गदर्शन/सेवा/शंकेचे निरसन/ध्यान शिबीराचे आयोजन) दान (मग ते कोणत्याही जाती-संप्रदाय-देशाच्या माणसाच्या विशुद्धीसाठी (मनाला निर्मळ बनवण्यासाठी) असो. हे‌ कुठल्याही प्रकारच्या दानात सर्व‌श्रेष्ठ दान‌ असते.


रण सहस्त्र योद्धा लडे, जीते युद्ध हजार ।

पर जो जीते स्वयं को, वही शुर सरदार ।।


क्षण-क्षण क्षण-क्षण बी ता, जीवन बीता जाय ।

इस क्षण का उपयोग करे बीता क्षण नहीं आय।।  


अशा प्रकारे स्वतःच्या जीवनाचा व इतरांनी दिलेल्या दानाचा सर्व समाजाच्या हितासाठी अहोरात्र मेहनत करीत असतो. 

भले‌ होवो!!

- संबोधन धम्मपथी.

९७७३१००८८६

Sunday, 25 April 2021

सब्ब दानं धम्मदानं जिनाती

दानाबद्दलचे काही  गैरसमज दूर झाले कि खूप  फायदा होतो. 

☸️ धम्मदानच‌ सर्व‌श्रेष्ठ दान‌ का असते? :

एखाद्या ला पैसा द्या,‌पण मग काही दिवसांनी परत गरज लागेल. पैसा कायम कुठे टिकतो? एखाद्या ला जेवण द्या, काही तासांनी परत भुक लागेल. भुक कायम कुठे मिटते?एखाद्या ला रक्त/अवयव दान द्या, काही दिवसांनी परत आजारी पडेल. आजार कायम कुठे मिटतो? तसेच एखाद्या ला औषध द्या, काही दिवसांनी परत आजारी पडेल. आजार कायम कुठे मिटतो? ह्या दानाचा परिणाम कायम नसतो. 



☸️ गरज पुन्हा लागतेच!! म्हणुन ही सर्व प्रकारचे दान साधारण दान झालीत. त्यांना‌ कोणालाच‌ हलके/कमी लेखत‌ नाही, तुम्हीही लेखु नका. पण त्यांची मर्यादाही ओळखा!!


पण प्रकृती/निसर्ग नियम दान लक्षात ठेवते.‌जे‌ पेराल ते कालांतराने उगवते. भरभरून निसर्गाचा प्रतिसाद मिळतो.


☸️ जसे एक आंब्याची कोण लावली‌तर हा निसर्ग/प्रकृती/कुदरत का कानुन त्या कर्माचं व त्यासारखेच मोठं मोठं फळ देतो. अनेक फळ व फळातुन पुन्हा मोठी झाडं येतात. 


☸️ तसेच एखाद्याने अन्नदान दिले, तर‌ निसर्ग त्यांच्या कर्माची फळं देतो...ह्या जन्मात किंवा पुढील जन्मात एकुण (ह्या जन्माचे व मागील जन्मी च्या कर्मफळानुसार) तसेच काळानुरुप व दर्जानुरूप   (जसे केळ्याचे फळ दर महिन्याला येते, पण आंब्याचे फळ उन्हाळ्यातच येते) तसे फळ मिळते.


 तो उपाशी पोटी झोपत नाही, खुप संपन्नता लाभते. तसेच औषधाचे , कपड्याचे, पैशाचे व इतर मदतीचे दान निसर्ग/धम्म अनेक पटीने देतो.


☸️ पण ह्या कुठल्याच दानाने जो‌ लाभार्थी असतो त्याच्या मनाची विशुद्धी व निर्मळता साध्य होत‌ नाही. दुर्गुण दुर होऊन मंगल शांती मिळत नाही. जसे आपल्याला दिसते कि अनेक पैसेवाले माणसे बैचेन व अशांत असतात. पैशाचा  होत नाही , कारण लोभ कमी होण्यासाठी, धर्म (धम्म : निसर्गाचे नियम ) व धर्मवान (सद्गुणी -सदाचारी-शुद्ध -संत) लोंकाची संगत व मार्गदर्शनही नाही. तु(मचे कर्म पैशाचे दान देण्याचे होते, तर पैसे मिळाला. धर्म(सुख-शांती) मिळवुन जर ती दान केली असती तर सुख-शांती मिळाली असती. 

धरम ना हिंदु बौद्ध है, सिख ना मुस्लिम जैन ।

धरम चित्त की  शुद्धता, धरम शांती सुख चैन ।।


☸️ पण जर जो कोणी करुण चित्ताने व निस्वार्थ भावनेने धम्माचे ( बुद्धवाणी: जी विशुद्ध मन व  कर्म निर्दोष बनवुन एकुणच  जीवन निर्दोष बनवते ) दान देतो किंवा धम्माचे दान मिळेल यासाठी मदत करतो, त्याला ह्या व पुढील अनेक जन्मातही निसर्ग/प्रकृती अनेक पटीने जास्त धम्मदान (बुद्ध वाणी जी सद्गुण व सुखशांती वाढवते) मिळवुन देते. अनेक धम्मविहारी व धम्मप्रवीण कल्याणमित्र मार्गदर्शक व मित्र भेटतात. ज्यामुळे निर्वाण/मोक्ष मिळुन लाखो-करोडो वेळा पुन्हा पुन्हा जन्म-मृत्युच्या फेर्यातुन मुक्त (भवमुक्त) होतो. 


☸️ पुन्हा जर जन्मच नाही तर भुख, आजार, दुःख, प्रिय व्यक्तीचा वियोग किंवा अप्रि व्यक्तीचा संयोग, दारिद्रय, दुर्भावना व मृत्यु पासुन कायमची सुटका होते. मग ज्यामुळे सर्व प्रकारच्या दु:खातुन कायमची सुटका होते, ते दान अर्थातच महान व सर्वोत्तम आहे ना?


☸️ संधी नुसार (कालिक) दान व संधी नसताना (अकालिक‌) दान: विवेकशील व्यक्ती हे चांगलं जाणते कि संधी असल्यावर (कालिक) दिलेले‌ दान खुप कल्याणकारी असते. जसे महापुर, महारोग, अग्निकांड, जागतिक साथ, बेरोजगारी, निवारा अशी संकटकालीन संधी मिळाल्यास केलेले संधीयुक्त /कालिक दान(जेवण, औषधं, पैसा, कपडे, सुव्यवस्थेची‌ तजवीज) हे संधी नुसार(कालिक) दान फलदायी असते.


☸️पण त्याहीपेक्षा श्रेष्ठ असते संधी नसताना ही केलेलं असं सार्वकालिक दान!! जे करताना मनुष्य वाईट वेळ जरी नसली तरीही स्वताची‌ सामाजिक जबाबदारी समजुन क्षमतेनुसार दान करीत जातो. आणि तेही धम्मदान (कर्म व जीवन निर्दोष बनवणारी बुद्ध वाणी चे दान)  ज्याने इतरांचे दुःख दुर होऊन, सुखशांती व सद्गुण वाढतील.


☸️असे जात-संप्रदाय न पाहता केलेलं धम्मदान  हे सदा-सर्वदा सर्वहितकारी दान असतं. कारण एकदा का मनुष्याचे मन निर्मळ, शोकविरहित व खंबीर झाले कि तो स्वताची रक्षा स्व:ताच करू शकतो. स्वतः सुखी राहतो व स्वतःची जबाबदारी ओळखुन वेळेनुसार समाजकार्यही करतो. 


म्हणुन भगवान बुद्ध म्हणतात कि, सब्ब दानं धम्मदानं जिनाती !!

भले‌ होवो!!

- संबोधन धम्मपथी.

९७७३१००८८६

 *साभार* : विपश्यना विशोधन विन्यास वरील आचार्य गोयंकाजींचे‌ हिंदी लेख.

 *नोंद:* जर लेखात काही चुक आढळल्यास भाषांतर मी केल्याने चुकीची जबाबदारी माझी आहे, आचार्यांची नाही.

Saturday, 16 January 2021

भीमा कोरेगावच्या ऐतिहासिक वीरांचे मनोगत व प्रश्न

 माझ्या वारसांनो तुम्हाला काही सांगायचे आहे, काही विचारायचे आहे. शंभराहून अधिकवर्षे गेली बघा बघता बघता. कोरोना काळ चालू आहे आशा आहे की तुम्ही सुरक्षित असाल.

 जास्त वेळ नाही घेत तुमचा नाही, काही सांगायचं होते म्हणून आलोय तुमच्या स्वप्नात. आमच्या नंतर एक महान, कर्तबगार व थोर शुरवीर होऊन गेला आणि तुम्हाला बरेच सांगुनही गेला, बाबासाहेब नावाचा!! तरीही काहीतरी चुकतंय म्हणून आलो मन‌ मोकळ करायला. 

आमच्याकडे त्यावेळी जे होते त्याने, जसे होतो तसे आणि मानवी जीवनाचे हक्क मिळवण्यासाठी आम्ही जीव झोकून लढलो. त्याला विजयस्तंभाला तुम्ही आजही वंदन करत असता. चांगले आहे, पण हे अजिबात पुरेसे नाही. नक्कीच‌ नाही.

जरी आम्ही लढलो तरी युद्ध पुकारण्यापूर्वी पहिली सामाजिक परिस्थिती अनेक वर्षे अनुभवली होती. ती सामुदायिक रित्या समजुन योजना आखली होती. हे पहा जर आम्ही आमच्या पूर्वजांचाच इतिहासाच्या घटनांचा आणि जागेचा उत्सव साजरा करीत असतो नुसतीच मानवंदना देत राहिलो असतो; तर ना आम्हाला मानवी हक्क मिळाले असते ना ही आमची पुढची पिढी जगली असती.




 _त्यामुळे तुमची हि एक तारखेची वंदना आम्हाला पुरेशी नाही. आमची इच्छा आहे तुम्ही काही तरी आम्हाला साजेसे बौद्धिक व धोरणी पराक्रम करावेत. आम्हाला ह्या प्रश्नांची उत्तरे देऊन तुमचाही पराक्रम सिद्ध करु शकता का?:_ 

⚡बाबासाहेब फक्त एकदाच का गेले भीमा कोरेगाव ला १९२७ साली, ते ही बौद्ध होण्याच्या २९ वर्षांपुर्वी?

⚡प्रगतिशील व दक्ष बौद्ध समाज म्हणुन तुम्ही आता कुठे व‌ कसे पडत आहात हे तुम्ही कसे, कधी व कुणाकडुन‌ शोधता ?

⚡तुम्ही बौद्ध व अस्पृष्य हा फरक कसा करता ? कि १९५६ सालाची धर्मांतर तुम्हाला कबूलच नाही ?


⚡बहुतेक शिकलेली व पैसेवाले बौद्ध आणि अस्पृश्य (जी समाजाची नवी शक्ती स्थाने आहेत) ते समाजापासून दूर का राहतात ? 

⚡तुम्ही विजयदिन साजरा करताना, एक समाज म्हणुन आपल्या समस्या कोणत्या व त्या कशामुळे निर्माण झाल्या याकडे कधी लक्ष देता का ?

⚡आमची लढाई एका विशेष जातीविरुद्ध/संप्रदायाविरुद्ध नसुन जातिव्यवस्थेच्या विरुद्ध आहे हे तुम्ही कसे विसरलात ?

⚡तुम्हाला विजयदिनी आत्मविश्वास व एकता वाढवायची असतो, कि ज्यांना आम्ही हरविले त्यांच्यावर हसायचे असते? अशाने दुश्मन तयार होतील कि दोस्त?

⚡१९५६ नंतर तुम्ही नक्की बौद्ध झालात कि एका संप्रदायाचे सात जन्माचे विरोधक झालात ?

⚡सध्याच्या घडीला समाजाकडे चांगला वैचारिक, सुज्ञ, धोरणी व विविध समाजमान्य नेता नाही(राज्यस्तरावरही नाही व राष्ट्रीय स्तरावरही नाही) याचे कारण काय हे तुम्हाला समजले का ?

⚡समाज म्हणून आपल्याला एक‌ प्रगल्भ नेता हवा आहे कि एक विदुषक ? तुमचे शेजारी व मित्र अशा नेत्यावर व समाजावर कितीही हसले तरी‌ नवीन प्रगल्भ नेत्याची गरजच वाटत नाही का तुम्हाला?




⚡बाबासाहेबांचे विचारांची पायमल्ली करीत विरोधी विचारधारा असणाऱ्या राजकीय पक्षाशी जवळीक करणार्या नेत्याला तुम्ही नेते पदावरून खाली का उतरविले नाही ? कसे उतरायचं हे तरी माहिती आहे का?




⚡एखाद्या नेत्याच्या फक्त २५ वर्षांपूर्वीच्या चांगल्या कामावर त्याला/तिला आज सन्मान का देता? त्यांचे/तिचे सध्याचे निकृष्ट काम, कामचलाऊ धोरण, फसवी/ स्वार्थी वृत्ती का लक्षात घेत नाही? नवा नेता कसा शोधावा हे तरी कळते का?

⚡प्रत्येक नवमुस्लिम/नवख्रिश्चन अस्पृश्याने ती अस्पृश्य आडनावे बदलुन परिपूर्ण धर्मांतर केले हे तुम्हाला का नाही समजले ? नामांतराविषयी तर बाबासाहेबांनी १९३७ साली "मुक्ती कोण पथे" पुस्तिकेतही सांगितलेले होते. 

⚡प्रत्येक नवमुस्लिम/नवख्रिश्चन अस्पृश्याने ती अस्पृश्य आडनावे बदलुन त्यांच्या समाजाची एकता वाढवली हे तुम्हाला का नाही दिसले ? जर आडनावावरुन जात कळते आणि बौद्ध होऊनही भेदाभेद होते (संधींपासुन डावललं जाते) तर तुम्ही तुम्हाला मिळालेली अस्पृष्यता दर्शविणारी नावे धर्मांतरानंतर तुम्ही का बदललेली नाहीत ?

⚡तुमच्या पुढच्या पिढीला तर सोडा आसपासच्या लोकांना बाबासाहेबांचं कर्तृत्व कळेल किंवा बाबासाहेबांचे सर्वांगीण विकसित भारताचे स्वप्न पूर्ण होईल असे कुठले काम तुम्ही करता ? 

⚡वेगवेगळ्या सोसायटीत गेलेल्या बौद्ध माणसाला तुम्ही कुठे व कसे ओळखणार ? बौद्धांची व अस्पृश्यांची आडनावे सारखीच आहेत.अस्पृश्य आडनावे न बदलेल्याने पुढची पिढी बौद्धसंस्कृती टिकवणार नाही याची कल्पना तुम्हाला का नाही आली ?

⚡बौद्ध भिक्षुं ची काळजी‌(जेवण, औषधे व‌ धम्म चर्चा) कोण‌, कधी, कशी व किती‌ घेता? का त्यांना कोणी नेहमी लक्ष व स्नेह देतात का?

⚡गोरगरीब जनतेचा विकास कुठल्या धोरणांमुळे होतो व ती धोरणे कशी टिकवावीत व सुधारावीत हे तुम्हाला माहिती आहे का ?



⚡बाबासाहेबांनंतर तुम्ही एक समाज म्हणून किती शाळा-कॉलेज बांधली आहेत ?

⚡ज्या (समाजाच्या) विकास रोपट्याला रोज पाणी व खत लागते, त्या रोपट्याला फक्त भीम/बुद्ध जयंती उत्सवात सगळा पैसा खर्च करून विकास रोपटे मरून जाते, हे तुम्हाला कधी कळणार ?




⚡तुमच्याकडे शिक्षण असताना आणि पसे देऊन कुठलीही विद्या मिळत असताना तुम्ही अजून ८४,००० बुद्ध उपदेशांपैकी किती उपदेश शिकलात ?

⚡आज अनेक राजकीय, सांस्कृतिक आणि सामाजिक गट आहेत पण ते एकमेकांचेच विरोधक आहेत, याचे कारण कोण शोधणार?

⚡अनेक गटांचे कारण नक्की समाजाच्या अहंकारात आहे कि दुश्मनांची विषारी चाल आहे, एवढे तरी तुम्हाला ठाऊक आहे का ?

⚡बाबासाहेबांच्या संविधानात आतापर्यंत साधारणतः १२० च्या हुन अधिक बदल झाले आहेत. ते का व कोणते हे तुमच्या सध्याच्या कुठल्या नेत्याने तुम्हाला सांगितले आहे? सुशिक्षित असून तुम्हाला ते का माहिती नाही ?  विघातक बदल थांबवायचे कसे माहिती आहे का?

⚡ बाबासाहेबांचे विचार तुमच्या पर्यंत पोहोचवणाऱ्या विचारवंतांना तुम्ही नियमित मानधन देता कि, टीव्ही च्या केबलवाल्याला ? तुमच्या पिढीला कोण वाचवणार हे तुम्हाला का समजत नाही ?


⚡मानवी हक्कांसाठी बाबासाहेबांनी वेळेनुसार नवनवीन लढाई लढत राहिले कि बुध्द -फुले-कबीरांच्या उत्सवात व वर्गणीत गाफील राहिले?

⚡बाबासाहेबांनी भिमाकोरेगाव चे महत्व बौद्ध झाल्यावर कधी व कुठे सांगितले हे सांगू शकाल का ?


⚡विपश्यनेला विरोध करणाऱ्यांना समाजाची कीड (दारू) , धुंदी व व्यक्तिमत्वाची अनेक व्यसने दूर करुन सुसंस्कारी समाजाचे निर्माण कसे करावे असा प्रश्न विचारला का ?

⚡तुम्हाला आणि तुमच्या पुढची पिढीला बौद्ध म्हणून ओळख/लौकिक आवडेल कि अस्पृश्य म्हणून ?

⚡तेव्हाची लढाई मैदानात व्हायची आताच्या ऑनलाईन युगात लढाई कुठे व कशी होते हे तुम्हाला माहिती आहे का ?

हे तीस प्रश्न दर महिन्याच्या तीसही दिवस तुमच्या मनात ठेऊन उत्तर शोधल्याशिवाय उसंत घेऊ नका.

🔊लक्षात घ्या " *इमाय धम्मानु-धम्म पटीपत्तिया बुद्धं पुजेमी"* म्हणजे बुद्ध पुजा/वंदना मी त्यांच्या धम्मानुसार वागुन (आचरणात आणुन) पूर्ण करीत आहे, नुसत्या फुले-अगरबत्त्यांने नाही. 

त्याचप्रमाणे दरवर्षी आम्हाला औपचारिक वंदन करण्यापेक्षा, ह्या व अशा अनेक प्रश्नांची उत्तरे शोधणे व त्या नुसार योजना आखून प्रगती करणे (आचरणात आणुन)हि तुमची खरी विजयस्तंभाला मानवंदना(खरा पराक्रम) ठरेल. ते तसे सोपे नाही, "बौद्धिक" पराक्रम सोपा नाही. नेहमी दक्षता व समजुतदारपणा दाखवावा लागतो.


तोच खरा पराक्रम ठरेल आणि तीच खरी वंदना‌ ठरेल. तेव्हाच तुमची पुढची पिढी तुम्हाला या "बौद्धिक" पराक्रमाबद्दल धन्यवाद/वंदन/अभिनंदन करीन .

 नाहीतर काही वर्षांनी समाज म्हणून आपण नक्की कोण हे विचारावे लागेल ?


आजच्या युगाला साजेसा असा पराक्रम करणार्यांना वारसांना भेटायला कोणाला आवडणार नाही . 
तुम्हाला जर एखादे महान काम जमत नसेल तर, नेहमीची छोटीशी कौटुंबिक व सामाजिक कामे महानतेने (कौशल्य, दक्षता,विनम्रता व सद्भावना  ...... म्हणजे एकुणच निर्मळ मनाने) करा. तुम्हाला देशाची व मानवतेची सेवा करण्यास यश लाभो हि सदिच्छा. 




Sunday, 15 November 2020

वादळी पावसातील दोन कळ्यांचे धैर्य

जुलै २०२० चा पावसाच्या महिना होता. जगभरात आणि महानगरी मुंबईतही करोना चा टाळेबंदी-लोकडाऊन असूनही करोनाचा कहर दर दिवशी नवनवी उंची गाठत होता. चांगली बातमी तशी दुर्मिळच होती. पण पर्यावरण स्नेहींना टाळेबंदी मुळे कारखाने बंद असल्याने वातावरणातील चांगला बदल दिसत होता. अशा परिस्थितीत सर्व जगातील सर्व प्रकारचे करोना योद्धे (डॉक्टर, आरोग्य कर्मचारी, सरकार यंत्रणा, पोलीस दल, सफाई कर्मचारी व नियमांचे पालन करणारी जनता) यांना वंदन, अभिनंदन व धन्यवाद देत, मी दोन जुईच्या कळ्यांची गोष्ट मांडत आहे. मानवी मनाच्या विकासासाठी!!

मला फुलझाडे लावण्याची आवड असल्याने विविध  फुलझाडे घरात लावतो. काही महिन्यांपूर्वी जुईचे  आणले होते. त्याला हळू हळू छान फुलेही येऊ लागली होती. पण त्या रोपट्याला हळू हळू कीड लागली व टीकाही केल्या कमी होईना. फुले यायची हि कमी झाली, तरी माझे नियमित लक्ष होते. काही दिवसानंतर दोन छान नवीन छोट्या कळ्या   आल्या व त्यांच्या फांदीचे टोक उन्हासाठी खिडकीच्या ग्रीलच्या बाहेरही  जाऊ लागली, मी साहजिकच आनंदी होतो. 



पण पावसाने चांगलाच जोर धरला होता, तशी सरकार कडून अगोदर  घोषणाही झाली होती.  जरी मला पाऊस खूप आवडतो तरी मला आज काळजी वाटत होती ती, ग्रील बाहेर डोकावणाऱ्या माझ्या नाजुक छोट्या कळ्यांची. दिवसभर चांगल्याच पाऊस पडला, त्या कळ्या जबरदस्त पावसाचे तडाखे खात दिवसभर जीव संभाळून/धरून होत्या . पण रात्री पाऊस जोरदार वाढला, कळ्यांना खूप तडाखे बसत होते व मी ते कोणालाही न सांगता शांतपणे  पाहत होतो. मी त्यांना घरात नाही घेतले, कारण मला अपेक्षा होते कि निसर्ग-प्रकृती ने त्या कळयांना "बहुतेक" वादळी पावसापासुन जगण्याचे शिकवले असणार. मला त्या कळ्यांचे धैर्य किती आहे हे हि पाहायचे होते, आणि जोरदार रात्रीच्या पावसात मी अंदाज लावला कि, आज हि बहुतेक त्यांची शेवटची रात्र असणार. ताळेबंदीतील सुधारलेल्या पर्यावरणात पावसाचा तडाखा नेहमीपेक्षा जास्तच होता. मी दिवसभर पावसात राहून थकलेल्या त्या कळयांना अभिनंदन व शुभेच्छांसह शेवटचा निरोपही देऊन निराश होऊन झोपून गेलो. 



    सकाळी उठलो आणि पहिला कळयांना पाहायला गेलो, हलका पाऊसही पडत होता आणि कळयाही डोलत होत्या. मला खूप आनंद झाला, कारण माझा अंदाज चुकला होता. त्या कळयांना अजूनही धैर्य होते. मी कोणासही काहीच बोललो नाही दुसराही दिवस आणि रात्र तशीच वादळाची होती. साधारणतः तिसऱ्या दिवशी जुईच्या काळ्या फुलल्या, मी तर खुपच खुश होतो. माझा आनंद परिवाराला  सांगितला. 



नंतरचे दोन दिवस त्या कळ्या  सुंदर सुवासिक फुल झाल्या. समाधानाने हसत त्यांनी खूप सुगंध दिला व प्रसन्नता हि दिली. साधारण तिसऱ्या दिवशी, त्यांच्या पाकळ्यांतील गंध आणि सौन्दर्य कमी झाले. आणखीन २-३ दिवसांनी त्यांना धरणीने कुशीत घेतले, कळ्यांचे कठीण जीवन पुर्ण झाले. त्या कल्याणी माझ्या मनात घर केले होते, आणि त्या झाडाकडे पाहताना मला त्या कल्यानेहमी आठवायचा.  नवीन १- २ आठवडे काही नवीन कळ्या आल्या, त्यांचीच आठवण घेऊन तेव्हा मात्र वादळी पाऊस नव्हता. पण नंतर मात्र एकही कळी  नाही आली. त्या झाडाला खूपच कीड लागली होती, मी अनेक वेळा नवनवीन उपाय योजुनही लाभ नाही झाला. माझ्या मनात अजूनही त्या वादळी पावसातील त्या दोन कळ्यांचा गंध  होता. आणि त्या गंधापेक्षा जास्त त्यांचे परिश्रम, जिद्द, चिकाटी आणि थोड्याश्या आयुष्यातही त्यांचे हसरे चित्र (ज्याने मला निर्वाणाचा नवा आयाम दाखविला) . 
 



नंतर कळत-नकळत तीन महिन्यानंतर माझ्या स्वतःच्या मनालाही खूप कीड लागली. मी  खूप उदास झालो, आसपासची आर्थिक  व सामाजिक परिस्थिती, कामगार-मजुरांचे हाल, खाजगी-सरकारी बंद होणाऱ्या नोकऱ्यांची बातमी; मी वास्तविक खूप व्यथित झालो. जणु काही उदासीन घटनांची मालिकाच समोर आली. माझा परीने  मी काही समाजाच्या घटकांना व सरकारला जरी अर्थसाहाय्य केले आणि जमेल तसे(अनियमित) ध्यान करत मंगल मैत्री हि दिली, तरी माझे मन खूप विषान्न व बैचेन झाले होते. वाटत होते कि मि  भारताचा  सुशिक्षित-सुस्थापित नागरिक म्हणून खूप कमी पडत आहे.  


मला एकुण भारतीय समाजाच्या विविध गरीब, दुर्लक्षित असहाय्य्य, असुक्षित व असंघटित वर्गाच्या भवितव्याने अस्वस्थ झालो. कुठेही काही अशी बातमी दिसत नव्हती कि ज्याने हा वर्ग स्वावलंबी बनेल किंवा त्यांची येणारी पिढीला किमान शिक्षण-आरोग्य-नोकरीच्या सेवा कशी मिळेल हे काही कळत नव्हतं. काही लोकां-मित्रांकडे मी बोलूनही दाखवले, पण ना उपाय मिळाला ना धैर्य  ना आशा!!  तिघांपैकी काहीतरी एक तरी मिळायला हवे होते. 


तेव्हा आदरणीय मेत्ताधम्मो भंतेजींशी बोलताना  मला स्वतःला आठवण आली ती ह्या  जुलै महिन्यातील दोन कळ्यांची!! मी त्यां कळ्यांची सगळी परिस्थिती आठवली. त्यातून मला धैर्य व आशा हि मिळाली जी ह्या समाजाच्या विविध गरीब, दुर्लक्षित असहाय्य्य, असुक्षित व असंघटित वर्गालाच नाही तर कुठल्याही  दुःखी -उदास मनाला प्रेरणा देईल; जशी मला मिळाली. 


काही कळालेली तत्वे आणि कळ्यांचे वास्तव (मानवाच्या समस्येवरील उपायांसाठी)  मी शब्दात मांडण्याचा प्रयत्न करीत आहे :
१. आता संकट जीवघेणे आहे आणि अपेक्षित काम होणार नाही असे जेव्हा वाटते, तेव्हा तसे  होईलच असे जरुरीचे नाही.त्या दोन जुईच्या कोमल कळ्यांनी वादळी पावसात मनाला नियंत्रित/प्रशांत करीत धैर्याचे व धाडसाचे दर्शन घडविले होते.  ( क्षांती   पारमिता ).  
२. जेव्हा असे वाटते कि, "हे मला शक्य होणार नाही, मीही कधी हि केलेले नाही. मला जमणारच नाही!", तेव्हा अपयशाशिवाय मला काही मिळुच शकत नाही असे म्हणणे चुकीचे आहे. त्या दोन नाजुक जुईच्या कळ्यांना  कसलाच  अनुभव नसतानाही वादळी पाऊस सहन केला होता, निसर्गाला/रोपट्याला अपेक्षित यश संपादन केले होते.  ( अधिष्ठान पारमिता )
३. आपल्यातील ताकत ही  तेवढीच असते जेवढी आपण ती आपल्या सत्कर्म व धैर्याद्वारे कमावतो. त्या दोन नाजुक जुईच्या कळ्यांनी आपल्या प्रगतीसाठी स्वतःची  क्षमता वाढवत(वीर्य पारमिता ) उन्हात राहून टाकत कमविली होती. तसेच रोपट्याचा उंच शेंड्याला जरी पोचले तरी, मातीतुन क्षार मिळवण्याचे कष्ट करणारी मुळे व स्वतःचे वजन पेलणाऱ्या स्वतःच्या पुर्वजांचे आभार व संलग्नता (नाते ) सोडले नाही (उपेक्षा पारमिता ). जरी त्या कळ्या खूप उंचीवर पोहोचल्या तरी, आपले समाजबांधव (पाने, खोड  व कधीही न दिसणारी मुळे) यांना आपल्या मिळकतीचा वाट (निष्क्रमण: बाहेर पडत उन्हात राहुन सूर्याकडून मिळालेली शक्ती) अखंडींतपणे पोहोचवली(मैत्री  व दान पारमिता ).   
४. नशिबाला न जुमानता आसपासच्या वाईट/विपरीत परिस्थितीतही तुम्ही दिव्य काम करू शकता. त्या दोन नाजुक जुईच्या कळ्यांनी हे दाखुवुन दिले कि जरी बहुतेक झाडाला जरी कीड लागली असली तरी, तुम्ही स्वतःला स्व-शुद्धी प्रक्रियेनुसार निरोगी ठेवून अशक्य असे काम करू शकता ( शील  पारमिता ).
५. परिस्थिती समोर हार मानण्यापुर्वी जो जो क्षण येईल, त्या त्या क्षणाला विचारपूर्वक व अनित्यबोध जागवत आहे तेवढे जीवन सुखी करू शकता. त्या दोन नाजुक जुईच्या कळ्यांना याची कल्पना नव्हती कि पाऊस त्यांना जगू देईल कि नाही, त्यांना फुलात येईल कि नाही, अजून किती वेळ कठीण काळ आहे कि नाही. त्यांनी याचे उदाहरण दिले कि, कुठलीही परिस्थिती कायम राहत नाही, बदलत असते. पाऊसही नेहमी(दर क्षणाला)  पडणार नाही. त्यांनी हे शिकले कि दर ५-१० सेकंदानंतरच पावसाच्या थेंबाचा तडाखा बसतो, तेवढ्यात मी आणखीन संयम व धैर्य कमविन. अनित्यबोध परिस्थितीद्वारे प्रत्येक क्षणी सजग राहत  समजुन घेईल( प्रज्ञा   पारमिता  तसेच आतापी - स्मृतिमान-संप्रज्ञानी  हा बुद्धांचा निर्वाणप्राप्तीचा  फॉर्मुला!!).
६. जर माझ्या कुटुंबाला/समाजाला कीड लागलेली असताना, मी माझ्याद्वारे माझ्या रोपट्याची/समाजाची उपयोगिता जसे सुवास/प्रसन्नता/चारित्र्य दाखवु शकलो  तरच माझे  रोपट्याचे/समाजाच्या प्रति कर्तव्य/ऋण  फेडु शकेन.  त्या दोन नाजुक जुईच्या कळ्यांना याची कल्पना होती कि, जर रोपट्याला कीड लागली व त्याला आता पूर्वीसारखी फुले येत नाही तर अशा रोपट्याचे जीवन संकटात येते. त्यामुळे त्याने रोपट्याची गुणवत्ता/उपयोगिता सिद्ध करण्यासाठी व आपल्या इतर समाजबांधवांवरील(पाने, खोड  व कधीही न दिसणारी मुळे)  संकट टाळण्यासाठी वादळाशी दोन हात करत  रोपट्याची गुणवत्ता/उपयोगिता सिद्ध करीत जमेल तेवढे करून दाखविले. रोपट्याची गुणवत्ता खरी ठरविली ( प्रज्ञा, दान, करुणा, वीर्य, अधिष्ठान, सत्य, निष्क्रमण  पारमिता )

७. जरी आज यश दिसले व सुबत्ता, सौन्दर्य व यौवन असले, तरी आपल्या यशातील वाटेकरी इतर समाजबांधव (पाने, खोड  व कधीही न दिसणारी मुळे)  यांना विसरून अभिमानाने आंधळे होऊ नये. कारण जसा पाऊस अनित्य होता, तसे सोंदर्य-यौवनही अनित्य/नश्वर/क्षणभंगुर आहे. विनम्रता व समाधानाच आनंद चेहऱ्यावर नेहमी ठेवावा.  त्या दोन नाजुक जुईच्या कळ्यांचे आयुष्य २-३ दिवसांचे मर्यादित होते. पण विनम्रता, कृतज्ञता, निरागसता (एकूणच मनाची शुद्धता)  व समाधानाच्या आनंदाचा गोडवा त्यांच्या  चेहऱ्यावर नेहमी आपोआप(प्रकृतीद्वारे) राहिला . फुल बनल्यावर तिसऱ्या दिवशी कोमलता, सौदर्य व सुवासिकता हळू -हळू सोडून गेली. पण ना हिरमोड झाला, ना वैषम्य आले आणि ना वैफल्यग्रस्तपणा  आला. मातीच्या कुशीत झोपताना, खूप सुख-खूप समाधान-खूप सफलता मिळाली. ती मृत्यु च्या वेळी त्यालाच मिळते ज्याला निर्वाण प्राप्त होते.  

८. जरी जीवन संपले तरी, सद्गुणी, मेहेनती, परोपकारी जीवन अनेकांना सध्दर्माची व उंच्चतम गुणवत्तेची(मानवी मूल्यांची)  प्रेरणा देते. त्या दोन नाजुक जुईच्या कळ्यांचे आयुष्य संपले व ४-५ दिवसानंतर नवीन एकही कळी आलेली नाही. पण त्या दोन मुलींनी/कळ्यांनी मला आजही प्रेरणा दिली(करोना नंतरच्या आर्थिक/सामाजिक स्थितीशी झुंजण्याची  व त्या सुवासिक जुईच्या रोपंटच्या गुणवत्तेची हमी/खात्री दिली( करुणा  पारमिता  . ती खात्री/विश्वास एवढा आहे, कि आज ४ महिन्यानंतरही एकहि कळी आलेली नसतानाही मी त्या झाडाला वाऱ्यावर सोडले नाही. नेहमी काळजी घेत आहे. ही आशा व विश्वास आहे, कि त्या दोन नाजूक जुईच्या कळ्यांसारखी झुंजार, लढाऊ, परिवाराशी संलग्न राहून काळजी घेणारी, सद्गुणी, चारित्र्यवान व सुंदर फुले येतील. भले आज नाही तर उद्या अवश्य येतील. कारण ते रोपटे अजून जीवंत  आहे, त्याची हिरवी पाने, निब्बर/(जे दिसायला सुंदर नाही)  खोड  व जमिनीखालील मुळे (जी फुलांसारखी सुंदर नाहीत) अजून मेहनत करीत आहेत, व आशावादी आहेत. एक दिवस प्रकृती/निसर्ग साथ देईन. ती किंवा त्याच्यासारखी धैर्यवान, सुवासिक अशी गुणवत्ता असलेली फुले येतील. 
८. जमेल तेवढे, जमेल तसे आणि जमेल तेव्हा धैर्यपुर्वक, निस्वार्थ  आणि सुयोग्य कामे करीत राहा.  कोण जाणे तुमचे  आशावादी, निर्दोष  आणि  निरोगी जीवन इतरांना जगण्याची नवी दिशा देईन. त्या दोन नाजुक जुईच्या कळ्यांचे आयुष्य संपले जे आशावादी, निर्दोष  आणि  निरोगी जीवन होते. त्या जीवनाने इतर कळ्यांना नवी उमेद दिली. मलाही शिकविले कि , कण्हत /कुढत/नाराज होत जगण्यापेक्षा काय करता येईल तेवढे पहा आणि करा. आपण वादळ किंवा पाऊस रोखु शकत नाही, पण आपल्याकडे असणारी सुविद्या, जिद्द, आशावाद आणि निर्दोष जीवन जगुन जीवनात 

त्या दोन नाजूक पण "कल्याणी" कळ्यांनी मला प्रचुर प्रेरणा व आशा  दिली. त्या दोन कळ्यांची जीवनकहाणी पाहता आसपासची आर्थिक  व सामाजिक परिस्थिती, कामगार-मजुरांचे हाल, खाजगी-सरकारी बंद होणाऱ्या नोकऱ्यांची बातमी अशा अनेक समस्यांवर सध्दर्माच्या मार्गदर्शनाने ( दहा   पारमिता  किंवा एकूण ३७ बोधिपक्षीय धर्म ) गोरगरीब-शोषित-(पुढारी नसल्याने ) अनाथ समाजघटक पुन्हा आशा  व धैर्य वाढवीत त्यांचे व त्यांच्या पुढील पिढीचे जीवन सुखी-शांतीपूर्ण-समाधानी करू शकतील. 

अनेक वादळे-संकटे-कीड येवोत, जोपर्यंत अशी फुले/कळ्या छोट्याश्या जीवनातही सहजता व सफलता दाखवतील, ते बळ देतील इतर कळ्यांना (सुस्थापित वर्ग ) समाजबांधवांना (  (पाने, खोड  व कधीही न दिसणारी मुळे म्हणजे  अप्रगत/विस्थापित  सामाजिक वर्ग ) !! )  विजय होवो त्या धैर्याचा, संयमाचा, समाजाच्या प्रति कृतज्ञतेचा, परहितबुद्धीचा व आंतरिक शुद्धीचा !! हाच आहे आशेचा किरण, कठीण दिवसात. 

भले होवो  त्या कळ्यांचे व त्याच्या स्वहीतबुद्धीचे तसेच परहितबुद्धीचे !!

संबोधन धम्मपथी 
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