Wednesday, 27 January 2016

दस पारमितायें

🌞१ : उपेक्षा (समता) पारमिता: अंदर व बाहर कि स्थितियों के अनित्य रुप को जानते हुये उनके प्रति ना आसक्ति व ना द्वेष जगाना।
सुख आये नीचे नही, दुख आये नही रोय||
दोनों मे समता रहें, उत्तम मंगल होय॥


🌞२: दान पारमिता: निस्वार्थ और औरों के कल्याण के लिये अपने उत्पन्न या संपत्ती का सम-विभाग करना। ये समझना कि ये संपत्ति तो मैने समाज से ही प्रप्त कि है, तो समाज के प्रति अपने कर्तव्य हेतु से दान करना। ये भी स्मरण रहे कि, दान तोलमखोल कर नही, अपनी उस समय कि क्षमता के अनुसार ही हो। एक बात ओर, दान का पुण्य तभी मिलता है, जब दान कर्ता का चित्त अहंकार रहित हो, और दान का पात्र व्यक्ति /संस्था वास्तव मे लोककल्याण के कामों मे रत हो।

🌞३: निष्क्रमण: लोककल्याण  के लिये गृहत्याग कर के अपने आप को अनिकेत, मलकियतरहित एवं मुक्त  अवस्था से परिचित करवाना। नह जीवन जो संन्यासी जीते है, प्रगति के लिये ध्यान करते हुये चित्त को जड़ों तक शुद्ध  करते है। पैसे व घर-महल के स्वामित्व के अहंकार से दुर करने के लिये दुसरो के दिये दान पर आधारित  भोजन  एवं आश्रम को अस्थायी  रुप मे (क्यो कि ये मै नही मेरा नही) स्वीकार  करते है। गृहस्थ  भी एसा करते है, भले ही थोडे से समय के लिये ही सही. जैसे १०.दिवसीय विपश्यना शिबीर साधक-साधिकाये किसी लाभान्वित साधक के मंगल दान द्वारा पुरा करते है।

🌞४: अधिष्ठान : दृढ़ संकल्प । अपने या किसी मित्र-पारिवारिक कों लाभ  या द्वेष हेतु नही। अपितु अपने वैयक्तिक एवं अपने सामाजिक कर्तव्य यों विरक्ति रुप से ( यानी यदि सफल हुआ तो भी समता व विफल हुआ तो भी समता) पुरा करने के लिये अपने आप को कटिबद्ध करना, मंगल  संकल्प पुर्ण करने कि प्रतिज्ञा करना, अडिग रहना।

🌞४: क्षांति पारमी: शुद्ध  धर्म का पालन करते हुये अपने आप (चित्त को) को आस पास कि कठीन-महाकठीन परिस्थितियों से व्याकुल न होने देना। आकुल-व्याकुल  बनानेवाले व्यक्ति-स्थिती-व्यवस्था को क्षमा करते हुये चित्त को आकुल-व्याकुल  न बनाना।

🌞५: प्रज्ञा पारमी: माने शरीर व चित्त कि मिलीजुली जीवनधारा ते अनित्य स्वभाव को देखना।  कैसे देखना? क्षण प्रतिक्षण रुप तथा मनविषयोंको के उत्पाद-व्यय व उसकी अनित्य कि अवधि को भी समझना। समझ कर स्वयं को समता मे बनाये रखना।
(सुधार हेतु आवश्यक सुचना ओंका स्वागत है)

६.🌞शील: शील तो धर्म (शील, समाधि, प्रज्ञा) का पहला प्रमुख  अंग है। उसे तीन रास्तो स्वच्छ रखा जाता है। देह कर्म, वाणी कर्म व विचारोंसे (मन कर्म ).
एसा कोइ कर्म जिससें अपनी तथा औरों कि शांती भंग हो, तो समझें कि शील भंग हुआ।
यदि कोई पुलिसवाला चोर को पकडता है। तो ये ना समझे कि चोर कि शांती भंग हुयी। औरों कि शांति  भंग कर के चोर ने जो स्वयं व्याकुलता कमाई है, उसे धर्मानुसार  दंड दे कर न्यायव्यवस्था ने तो समाज कि व चोर कि भी शांति  सुनिश्चित की है। तो इस प्रकार विचार परिपुर्ण हो।
समझें कि पिता ने पुत्र को परिक्षा के कारण डांटा। तो अगर पुत्र कि शांती नही बढी व विपरीत परिणाम से उसकी उद्धतता-क्रोध बढा तो समझे कि शील भंग हुआ। भले उद्देश्य कितना भी मंगल क्यो न हो, मन मे करुणा-उपेक्षा-मैत्री न हो तो उनके दुश्मन द्वेष-व्याकुलता-वैरभाव जगह ले लेते है। तो मन के रास्ते ये दुश्मन वाणी या शरीर के रास्ते प्रकट हो कर काम बिगाड़ देते है। तो शील पहले मन का टुटता है, पश्चात वाणी का व पश्चात शरीर का।
बुद्ध कहते है: मनो पुबंगमा धम्मपाल, मनोसेट्ठा मनोमया...



🌞सत्य: जो सत्य है उसे ही वाणी, लेख व आचारोंसे प्रकट करे। जैसे कोई आदमी अंधेपन का स्वांग करता हें तो नही असत्य लिखता या बोलता है यद्यपि आचार तो असत्य ही है। तो शील भंग ही हुआ ।
लेकिन फिर भी केवल सत्य ही कल्याणकारी नही होता। वह तभी कल्याणकारी होता है कि सुननेवाला औरसजिस के बारे मे बोल रहे हो उस का भी मंगल समायोजित है। यदि किसी चोर ने पुछा कि बताओ तुम्हारे मित्र की संपत्ति कहा छुपी हो, तो सत्य नही कहना चाहिये। सत्य तभी लाभदायक होगा जब उसमें  मंगलकामना निहित हो।


🌞 वीर्य : पुरातन भाषा में  इसका अर्थ है पुरुषार्थ माने तब तक कडी, प्रामाणिक, जागृति व विचारपुर्वक कष्ट करे। किस के लिये करें ? जो  ( मंगल ) अधिष्ठान (पारमिता ) किया है ना, उस के लिये।
दृढ़ संकल्प करना एक बात। कार्य को आरंभ करना दुसरी बात। परंतु कार्य को उत्साहपुर्वक संपन्न करना इसे कहते है वीर्य/पुरुषार्थ । जो पारमी पुरुष ही नही, स्त्रियों मे भी विकसित करने कि क्षमता होती है।


🌞. करुणा: सहानुभूति। के ये तो अपने मनसंस्कारोंके परिणामों से अज्ञ है। इनका आचरण तर्कसंगत, बुद्धिसंगत, कल्याणकारी, क्रोध, ईर्ष्या , वासना तथा भ्रम सेे भरा है।
नियती, निसर्ग तो उन्हे इसका दंड देगी ही। पर एसा ना हो रे!! अबोध है, अन्जान व भ्रमित है। प्रकृती करे एसा हो कि इन्हें दंड ना मिले। ये भाव सारे प्राणीमात्र (पक्षी, प्राणी-सरीसृप, जलचर, दृश्य-अदृश्य ) मन मे जागा ते समझो कि करुणा विकसित हुयी है।

१०🌞मैत्री : समस्त प्राणीयों के प्रति करुणा आने पर आगे कि पारमिता है। कि चलो कैसे इन्हे मै कुशल-अकुशल कर्मों के कारणों से, उनके (वर्तमान एवं भविष्य) के परिणामों से, उन्हे जडों सहित निर्मुक्त के लिये सद्धर्म सिखाऊ। चित्त विशोधिनी विपश्यना विद्या सिखाऊ(यदि मैं प्रमाणित विपश्यना  आचार्य हो तो ही) या ऊससे परिचित करवाऊ. तो वें सन्मार्ग पर चले सद्धर्म के सारे लाभोंसे  परिपुर्ण हो। सारे वर्तमान व भविष्य के भ्रम, दुर्गुणों व अकुशल कर्मोंसे सुदुर हो। इतना ही नही, भुतकाल के संस्कारोंसे भी समतापुर्वक मुक्त हो।
इसके लिये प्रयास करुंगा क्योकि मैत्री जागी है। अपने वैयक्तिक कामकाज व कारोबार को छोडकर (निष्क्रमण पारमिता ) थोडा ही सही अपनी क्षमता नुसार लोककल्याण करु!! ये यह मैत्री पारमिता

(सुधार हेतु सुचनाओं का स्वागत है।)
क्रमशः प्रत्येक पारमिता कि तीन उप-पारमिताये.अर्थात कुलमिलाके १०*३=३० पारमितायें।
शब्दांकन, लेखन: संबोधन धम्मपथी 

Thursday, 26 November 2015

जातिवाद का उपाय तथा एकसंघ भारत

जयभिम बंधुओ,

खुद्शहजी के लेख एवं विशय दॊनो उचित हि है. आरक्षण  लाभार्थी आरक्षण के लाभ  उपरांत अपनी अपने समाज के प्रति जिम्मेदारियों को आसानीसे दुर्लक्षित  कर देते है. परमपूज्य डॉ. बाबासाहेब का आरक्षण से उद्देश्य था  की, लाभार्थी अपने समाज को प्रगति सन्मुख करे, उन्हें प्रगति और अधोगति के कारणों से अवगत कराये. उनको उनके मानवी अधिकारोसे परिचित कराकर उन्हें प्रगतिपथ पर चलने के लिए एवं मानवी अधिकार पाने के लिए निरंतर प्रेरित करते रहे. इससे वे अपने जीवन को भलीभांति प्रगति की और ले जा सकेंगे।  तथा छुआछूत मिटाके विकासभिन्मुख समाज का निर्माण कर अपने भारत देश की भी सेवा करेंगे. क्योंकि सर्वअहितकारिणी चार्तुवर्णी व्यवस्था भारत को अनेको प्रकार से विकसाभिमुख होने से अनेको शतकों से  रोकती आ रही से.  परंतु आरक्षण से लाभान्वित पिछड़ा वर्ग अपने कर्तव्य  रहा है. ये एक समस्या है, पर अभी तक हम ने समस्या के जड तक नहीं पोहोंचे है। आरक्षण के लाभार्थी तो बुद्धिमान मनुष्य ही है. हमारी तरह उनका शरीर भी मन के हिसाब से ही चलता है.
तो समस्या तो मानसिक ही होगी।

 तुलना के तोर पर देखे कि, किसी व्यक्ती को बाजार से सामान लाना है. और बाजार में दो प्रमुख दुकाने है. एक पर तो भारी भीड़ उमड़ पड़ी है. पर दूसरी तो बिलकुल ही सुनसान है. तो साधारण मनुष्य तो पहिली वालीपे है जायेगा, भले भीड़ में अनेक कष्ट क्यों न उठाने पड़े. ठीक वैसे है, बुद्धिमान परंतु पथभ्रष्ट आरक्षण के लाभार्थी तथा वंचित दोनों की विचारसरणी समान है. भीड़ जहा वहा का सामान ताजा एवं किफायती ही होगा; क्योंकि अनेक लोग लाभ उठा रहे है ना !!. ये तो सामान्य मानवी स्वभाव है, क्योंकि मनुष्य तो सामाजिक प्राणि है, उसे समाज में रहना पसंद  है। उस में भी वो उसी समाज का चयन करेगा, जो शक्तिशाली हो और उसको सुरक्षा-सन्मान दे सके.

ठीक वैसे ही, पथभ्रष्ट-कृतघ्न लाभार्थी दलितों की स्थिति है. उन्हें जहा भीड़ दिखती है वहा दौड़ते है. और तो और इस ज़माने में कोन अपने आप को दलित-अछूत कहना या कहलवाना पसंद करेगा. जब की दलित शब्द द्योतक है अपमान, अशुभमुलक, गुलाम लायक, छू-अछूत लायक , उच्च-नीच भेदभाव का स्मरणरूप!!! अगर कोई  कहे की में दलित हुँ, निश्चित ही उसी क्षण से ही औरों की दॄष्टि में सन्मान खोने की संभावना अधिक है. इसके साथ दलितों के न्यूनगंड कारण तो उन्हें को फिर से गुलाम बनाना बड़ा सहज होता है.   शक्तिशाली समाज में तो जात छुपाने पर सन्मान भी तो मिलता है. कोन साहेब कहेगा की में दलित हु? साहब की तो छोडो, प्यून तक नहीं कहेगा की में दलित हु. क्योंकि की इससे सुरक्षितता एवं सन्मान नहीं मिलेगा. खास कर कि तब, जब की आज आधुनिक वर्ग में  भी आरक्षण एवं जातीयवाद के कारण उठाव हो कर दलितों पर अनेको आतंकी अत्याचार हो रहे हो।  पथभ्रष्ट दलित लाभार्थीयोंकि सोच जिनसे वो अपनी सही जाती/वर्ग,  उनका सही तारणहार, उनकी कर्तव्यवृत्ति छुपाये हुए है उसका कारण यही है, की जाती/तारणहार/कर्तव्यवृत्ति क उजागर करने पर लोग उन्हें निकम्मा,  समाज का बोझ,  सिर  उठाके चलनेवाला गुलाम समझेंगे। उनसे नौकरी-व्यवसाय में समानता-बढ़ोत्री  नहीं देंगे, न उन्हें किसी काम का लायक मानेंगे, उसे उस की मनपसंद ऊँचे जात की रुपसुन्दरी कन्या नहीं मिलेगी और अपने बहेना  विवाह  चिंता भी सतायेगी. और हो सकता है की सामाजिक बहिष्कार का भी सामना करना पड़ेगा. तो कैसे इस बहिष्कार एवं अपमानजनक  दुर्व्यवहार से बचे? तो सुरक्षितता के कारण जात छिपाते है और अपने सामाजिक कर्तव्यों  से मुख मोड़ लेते है .इसीलिए सुरक्षितता व सन्मान पाने के लिए अपने को दलित न कहना एवं दलित प्रगति अभियान से दूर रेहना भले ही कृतघ्नता है, पर इसके बिना उनके लिए कोई विकल्प उपलब्ध ही नहीं है!  क्योंकि गावों में दिनदहाड़े और शहरों में कूटनीति से अन्याय और अत्याचार बिखरे हुए दलितों पर हो है.

इसके बचाव एवं मनुष्य-समानता जागृति पर काम धीमी गति से हो रहा है. इसीलिए कृतज्ञ, प्रगतिशुर एवं इतिहास जाननेवाले दलित तो प्रगति और जातपात नष्ट करनेवाली व्यवस्था बनाने के लिए अन्य दलितोंकी (खास कर के पथभ्रष्ट दलित लाभार्थीयों की) मदत एवं जागृति चाहते है।  जो पूर्ण रूप से उचित भी है. पर ऊपर बताने वाले कारणों के कारण नहीं हो पा  रहा है. क्यों की जैसे ही दलित शब्द आता  है, व्यक्ति  असुरक्षितता (सामाजिक एवं आर्थिक जैसे नौकरी-व्यवसाय ) व अपमानजन्य बर्ताव से कमजोर बन जाता है. तो पथभ्रष्ट, जाट छुपानेवाले लाभार्थी दलित और प्रगतिशुर-कृतज्ञ दलित दोनों की स्थितियां भिन्न है. पर हमें तो उत्तर खोजना है की क्या करे जिससे दोनों ही बाबासाहब की अपेक्षा को पूरा करके समस्त समाज से ऊचनीच का विष को नष्ट करे.



तो सही उपाय क्या है, यह सोचना चाहिए. पर इस लिए अधिक मेहनत की जरूरत  नहीं है. परमपूज्य बाबासाहब ने तो इस परिपूर्ण तथा परिशुद्ध उपाय हमें पहले से ही दे चुके है. हमें दलित शब्द ही हमारे जीवन से निकालना होगा।  उदहारण स्वरूप, अंधेरा शब्द ये बताता है, की वह एक अनचाही स्थिति है, जो उजाले के आभाव से ही होती। उजाला प्रगति का स्वरूप है, अंधेरा नही. जब प्रत्येक जगह प्रकाश होगा, अंधेरा हि नही है, तो अंधेरा शब्द ही लोगो की स्मरण से मिट जाएगा.

ठीक वही भावना सवर्ण-अवर्ण(दलित) के बारे में है.  जैसे ही ये नकारार्थी/गुलामीदर्शक  शब्द प्रगति योजना से दूर होगा, लोगो का अपमान/प्रतारणा नहीं होगी, और सामाजिक सन्मान बढ़ेगा और असुरक्षितता दूर होगी, क्योंकि अब एक समाज प्रगति कर रहा है, दलित समाज नही. क्योंकि 'दलित समाज प्रगति कर रहा है, याने मेरा गुलाम प्रगति कर रहा है' ये भावना ही क्रोध को जन्म नहीं देगी. तो होगा यु की जिन जातीयवादी व्यक्तियोंसे हानि होने वाली थी, उनका अहंकार जगाने वाले कारण को हमने दूर कर दिया है. 'पिछड़ा समाज प्रगति कर रहा है.' तो पिछड़े वर्ग को हानि न होने की संभवतः अधिक होगी की, क्योंकि जिस शब्द से मल्कियत एवं गुलामी का संभव है, उस घृणास्पद एवं अहंकार जगानेवाले 'दलित' शब्द को हमने प्रगतियोजना के शब्दकोश से अपनी और से मिटा दिया है.

क्या होगा इस शब्द मिटाने से? आज की मनोविज्ञान के आधार पर आप जो सोचते हो, वैसे ही आपका बर्ताव, आचरण एवं समाज में प्रतिमा बनती रहती है. 'में एक दलित/अछूत हुँ, और में दलित/अछूतों की लिए काम करता हूँ.' तो इस वाक्य से मेने मान ही लिया है की में समाज की एक कमजोर कड़ी हू।  ये कमजोरी अपने आचरण, विचार, आपसी संबध एवं योजनाओं में सहज चली आती है. न्यूनगंड बनता रहता है. और कौन चाहेगा की इस दुनिया मे  में कमजोर बनु? कोई नहीं न, तो क्यों न मिटाये इसी अंधकार को? इस गुलामीदर्शक एवं अहंकारकारक शब्द को?

इस स्पष्टीकरण से दलित शब्द का प्रयोग कर के, हम स्वयं ही प्रगति से जुड़े हुए लोगो की प्रतारणा कर रहे है, अपमान कर रहे है. क्या ऐसा हो सकता है, पिछडे वर्ग एकजुट हो पर बिना दलित शब्द का प्रयोग किये? हो सकता है!!

ये हाल तो है अधिकांश लोगो का! समाज में ऐसे भी है, जो ये सोचते है की अगर मेने बाबासाहब के आरक्षण ला लाभ उठाने पर जो  हुआ है उसके बदले बाबासाहेब की लाभर्थियोंसे परोपकार की अपेक्षा है, उसे पूरा नहीं करूंगा  तो मेरा क्या  बिगड़ेगा? कौन  पकड़ेगा मुझे या कौन  दोष देगा? तो ऐसे लोगो की बीमारी को कोसने से गाली  देने से क्या दूर होगी? उन्हें आत्मज्ञान/आत्मपरीक्षण ही करना होगा न? तो उसके लिए प्रेम से अकुशल कुशल कर्मो के परिणामों  से अवगत करने की लिए आईना  दिखाना होगा।  मन का आईना, विपश्यना विद्या सीखकर दूसरों के प्रति अपने कर्तव्यों से अवगत व उत्साही बनाना होगा. 



बाबासाहब ने जीवन के अंतिम चरण में, दलित शब्द मिटाने की, मनुष्य को आत्मनिर्भर एवं विज्ञानंप्रेमी बनाने की एवं भारत को एकसंघ बनाने के लिए १४ अक्टूबर १९५६ में प्रगति योेजना की नीव रखी थी. मेरे विचार से इसी से ही सन्मान, स्फूर्ति, आत्मबल, सुरक्षितता, मनोविकार, एकता, विज्ञानप्रेम एवं दलित/अछूत शब्दों से मुक्ति मिलेगी. इसीसे आरक्षण लाभार्थी पुनः अपने प्रगतिशुर बंधुओ का भार ढाने में मदत कर पायेँगे.

इस यशस्वी संकल्पना पर पुर्नविचार हो ये सबको आवाहन है.


भवतु सब्ब मंगलं!

संबोधन धम्मपथी















Saturday, 5 September 2015

शोले चित्रपटातून शील वृध्दी

शोले चित्रपटातून शील वृध्दी 

मनुष्याच्या स्वभावावरती इतर बाह्य गोष्टीसोबत  चित्रपटांचा फार प्रभाव आहे. चित्रपट त्या त्या प्रेक्षकवर्गाच्या संस्कृती, चालीरीती, आचारविचार, व वेशभूषा खूप परिणाम करतात. त्यातला समाज मनावर खूप प्रभाव असलेला चित्रपटातून मी काय धम्म शिकलो, ते मांडत आहे. बुद्धाशिष्याने मनोरंजनाशीच काय कुठल्याही घटक/घटनेशी संपर्क आला कि स्मृतीमान राहुन त्यास्थितीची तुलना धर्माच्या विविध मुल्यांशी केली पाहिजे. अशाप्रकारे स्वता:तील असलेले गुण टिकवले व नवीन गुण मिळवले पाहिजे. तसेच स्वतःतील असलेले दुर्गुण ओळखून ते दूर करण्याचा व नसलेले दुर्गुण कधीही स्वभावात न येण्याचा निरंतर प्रयत्न केला पाहिजे. हाच तर सम्यक व्यायाम आहे.

ह्या चित्रपटात भलेबुरे पात्र आहेत. बोधिपथावर शीलपालन हे पहिले पाउल आहे; त्या नंतर समाधि व प्रज्ञा हि स्टेशने येतात. पण बऱ्याचदा गाडी  पहिल्या स्टेशनावरच फसते. तेव्हा शील पालनाचा धडा पुन्हा गिरवावा लागतो. 

शोलेच्या एका घटनेवरून शील पालनाचा काही संयम व युक्ती कमवुया. कथेतील पात्र जय-वीरु हे बेवारस व जगात कुणीच नातेवाइक नसलेले चोर व जीवाभावाचे मित्र असतात. वीरु जयकडे बसंतीसोबत लग्नाचा विचार मांडतो. त्यावर जय न कचरता (मुसावादा वेरमणी सिखापदं समादियामी - स्पष्ट बोलणे ) वीरुने आत्तापर्यंत अनेक मुलींसोबत लग्नाच्या आणाभाका घेतल्याची आठवण करून देतो. खऱ्या  मित्राने अशाच  प्रकारे संयमाने आपल्या मित्राचे दुर्गुण त्याला योग्य समयी व योग्य वेळी दाखवुन दिले पाहिजे. मैत्री टिकवण्यासाठी खोटे बोले नये व मित्रासाठी इतरांचे नुकसान करू नये. 

यावर वीरु जयला सध्याचा विचार गंभीर व अंतिम आहे असे सांगतो. असे आश्वासन देवून देखील जय त्याच्यासाठी लग्नाची बोलणी करण्यास नकार देतो. कारण जयला  वीरूचा स्वभाव माहिती असल्याने स्वताच्या मित्राची (आसक्ती/मोह/पुरुषसुलभ भावना किंवा प्रेम ) यांची तमा न बाळगता त्याच्याकडे चांगल्या वराकडे आवश्यक असणाऱ्या  गोष्टीची पाहणी करतो. ह्या पाहणीत त्याला असमाधानकारक उत्तर मिळते. तेव्हा तो वीरुला नकार देतो. आपल्याकडे हे असे होत नाही, कारण माझ्या मुलगा/मुलीला तिच्या/त्याच्या पेक्शा जास्त चांगला व लायक वर मिळावा  अशी आपली अपेक्षा असते. त्यासाठी स्वतःच्या मुलगा/मुलीचे  काही गुणही लपविले जातात; तसेच काही गुण वाढवून सांगितले जातात. का? कारण चांगले स्थळ हातातून जावू नये म्हणुन. तसेच स्पष्ट व्यक्त्या व खरे बोलणाऱ्या  माणसाला अशा प्रसंगी सोबतही नेत नाहीत उगाच गडबड नको म्हणुन. 

काही जण म्हणतात प्रेमात व युद्धात सर्व काही माफ असते; पण बुद्ध म्हणतात प्रेमात व युद्धातच माणसातील खरे सद्गुण व नैतिकतेची खरी परीक्षा असते. त्यामुळे अशावेळी जर तुम्ही शील पालन नाही केले तर समजावे कि तुमचे शील अजून खूप कच्चे आहे. त्यामुळे चोर असूनही आपल्या जगातील एकमेव सहकाऱ्यासाठी तो एका कर्तबगार व मेहनती मुलीच्या आयुष्याशी न खेळण्याचा योग्य निर्णय घेतो. येथे शीलाचा विजय होतो. पण वीरुनेही खूप आग्रह केल्यावर जयची  अडचण होते. कि याचे नाते घेवून जायचे तर तिच्या पालकाला (मावशीला) सांगायचे काय? याचे गाव कुठले? कुटुंब ? पगार? स्वभाव? घर? व्यसन? गुण? एकही तर बाजु सकारात्मक नाही. अशाच कात्रीत बऱ्याचदा पंचशीलाचे पालन करणारा सापडतो. त्यावर त्यास शील व बुद्धिमत्ता वापरुन परिस्थिती नेसर योग्य निर्णय घ्यावा लागतो. येथे जरी जय वास्तवात चोर असला तरीही, त्याने जेवढे जमेल तेव्हढे शील पालन केले आहे. कारण त्याला एका चांगल्या मुलीचे आयुष्य हि वाया घालवायचे नाही व स्वतःच्या प्रेमासक्त तसेच व्यसनी मित्राला चांगले गृहस्थ जीवन जगण्याच्या अधिकाराविषयीही बोलायचे आहे. 

अशा कठीण प्रसंगी समाधि आपल्याला मन एकाग्र करीत समस्या समजून घेण्यास मदत करते. व प्रज्ञा निर्णय घेतेवेळी दुर्गुणांना सद्गुणांवर विजय न मिळवायची क्षमता प्रदान करते. मी काही चुकीचे तर करीत नाही ना? मी मित्रा खातर किंवा स्वतःसाठी कोणाला फसवीत तर नाही ना? जयने समाधि  व प्रज्ञेचा  अभ्यास केलेला चित्रपटात दाखविलेला नाही. पण आपल्या जीवनात आसपास काही साधारण व्यक्ती ही समाधि  व प्रज्ञेचा  अभ्यास केलेला नसताना  उत्तम धैर्य व बुद्धिमत्ता दखवितात.जय मावशीकडे मित्राचा हात मागायला जातो. कदाचित मागील एखाद्या जन्मात (आत्म्याशिवाय पुर्नजन्म) समाधि  व प्रज्ञेचा  अभ्यास केलेला असण्याची शक्याता नाकारता येत नाही,  कारण तेव्हाच तर अशी संयमीनिर्णय घेण्याची क्षमता येते. आणि ज्यांनी विपश्यना करीत समाधि व प्रज्ञेचा अभ्यास व्यवस्थित केला त्यांना तर धैर्य उत्तमच साधता येते.

जय मावशीकडे मित्रासाठी बसंतीचा हात मागायला जातो. स्वाभाविकच त्या अनोळखी तरुणाशी मावशी चौकशी करते. धर्म चर्चेसाठी सविस्तर देत आहे. कुशल-मंगल विचारल्यावर पुढील संवाद असा:

मावशी: किती कमावतो मुलगा?
जय: आता काय बोलू मावशी, एकदा का बायको मुलांची जबाबदारी अंगावर पडली कि कमवायला ही लागेल.

(असे बोलून जयने  खऱ्याने सुरुवात केली. वीरूचा कामचुकार पणा सांगितला; पण सोबत वीरूच्या प्रेमळ मनाचीही खात्री दिली. )
मावशी: मग आता काहीच कमवित नाही?
जय : नाही. मीअसे कधी म्हणालो? पण काय करणार जुगार हा प्रकारच असा आहे, रोज रोज तर जिंकत नाही ना माणुस! कधी कधी हरतो सुद्धा.
(आता इथे जय जरी वीरूचे नाते घेवून आला असला तरी टप्प्याटप्प्याने वीरूच्या स्वभावातील गुण-दोष मावशीला झेपू शकेल एवढ्या शांत व सहज रीत्या सांगण्याचा प्रयत्न आहे. कारण मित्राचे घर व्हावे हे त्यालाही वाटत असणार.)

मावशी: हं… म्हणजे मुलगा जुगारी आहे?
जय : छे छे तो तर खुपच चांगला व गुणी मुलगा आहे. हो पण एकदा का दारु पिला तर चांगल्या वाईटाचे काही कळत नाही. (इथेही मनोरंजनाच्या एक सहज सामाजिक व मंगल संदेश मिळला आहे. कि दारु पिल्यावर त्यालाच काय कोणालाही काही कळत नाही) आता त्यांनंतर बसविले कोणी जुगार खेळायला तर त्यात बिचाऱ्या  वीरूचा काय दोष? (दोन वाईट गोष्टींचा संबंध बघा, जुगाराचा नाद हा  बेहोषीत असताना लागतो. दारु प्पिल्याने नशा येते. जसे थेंबे थेंबे पाणी साचते तसेच थोडेसे ही कुकर्म, नवीन कुकर्माला प्रोत्साहन देते, जन्म देते, बळ देते.  आता इथे जयने तोंडाने तर बाजु घेतली आहे, पण त्याचा उद्देश्य तर मावशीपासुन सत्य न लपविण्याचा आहे. मित्राची बाजु मांडणे  व त्याचवेळी एका होतकरु, कर्तबगार मुलीच्या आयुष्याशी  ही त्याला खेळायचे नाही आहे. अशा धर्म संकटात त्याने अशा प्रकारे चलाखीने सामना केला आहे. आपल्यालाही जीवनात अशा चलाखीने सामना करायला शिकायला हवे.)
मावशी : खरे बोलतो रे तू बाबा. दारुडा तो व जुगारी तो पण त्यात त्याचा काही दोष नाही.

(भ. बुद्ध म्हणतात, "अत्त ही अत्तनो  नाथो, अत्त हि अत्तनो गती" स्वताच्या दशेला व प्रगतीच्या (धार्मिक व व्य्यावहारिक) गतीला मनुष्य स्वतःच जबाबदार असतो. त्यांमुळे तुझ्या वर्तमानकाळाचा व भविष्यकाळाचा तूच विधाता आहेस. कारण कर्म (शारीरिक, मानसिक व वाचिक) तर कळत-नकळत किंवा मजबुरीने तूच करीत असतोस. तथागत हि कर्मे निर्दोष राहावीत  तुला  मार्गदर्शन नक्की करू शकतात. पण त्यावर चालावे तर तुलाच लागेल. जसे ज्याला तहान लागते, पाणीही त्यालाच प्यावे लागते. )

जय : मावशी तुम्ही माझ्या म्नित्राबद्दल गैरसमज करीत आहात. एकदा का त्याचे लग्न बसंतीशी झाले, तर हि जुगारीचि सवय तर दोन दिवसातच सुटून जाईल.
(हा महान व मोठा गैरसमज किंवा भाबडा आशावाद लग्न जुळवताना असतो. त्यामुळे मुलाची काही त्याज्य  दुर्लक्षित केली जातात. आणि त्या समज किंवा भाबडा आशावादाचा फटका आयुष्यभर त्या मुलीला भोगावा लागतो. कारण लग्न करताना जीवनसाथी किती निर्दोष, व्यवहारी व कर्तबगार आहे हे न बघता तो किती पैसेवाला, जात/धर्म वगैरे, किती गोरा/गोरी, किती शिकलेला, जमीन/बंगला किती? यावर जास्त लक्ष असते. ह्यात वडिलधाऱ्या  मंडळींचा अडाणीपणा, सदचराला कमी महत्व देण्याचा स्वभाव व अधार्मिकपणा असतो.)

मावशी: अरे बाळा, मला म्ह्तारीला सागतोस? ही दारु व जुगारीची सवय कधी सुटली आहे कोणाची आतापर्यंत?
(जग बघितलेली व भाबडा आशावाद न ठेवणारी माणसे चांगली जाणतात कि असे व्यसन लागले कि ते मरेपर्यंत माणसाच्या पिच्छा सोडत नाही. ते सोडण्यासाठी मनची खंबीरता व दृढनिश्चय खूप महत्वाचा. जो विपश्याने ने साजः मिळवता येतो.)

जय : मावशी तुम्ही जायला ओळखत नाही, विश्वास करा तो अशा प्रकारचा माणूस नाही. एकदा का लग्न झाले कि तो गाण्याऱ्या  स्त्री कडे जाणे सोडून देईल. मग दारु काय आपोआपच सुटेल!! (इथेही वाईट व्यसन एकमेकांवर अवलंबुन आहेत. एक लागलीकि दुसरी लागलीच म्हणुन समजा। शील पालनात कामेसु-मिच्छाचारालाही खूप महत्व आहे. शरीराने, बोलण्याने व विचारानेही मनुष्य व्यभिचार/परस्त्रीगमन करू शकतो. अशा स्थळी चावट -आचरट व वासनेने बरबटलेले लोक जात-येत असतात.)
मावशी : अरे देवा एवढेच काय ते बाकी होते? म्हणजे त्याचे गाणाऱ्या  स्त्री कडे ही येणेजाणे आहे तर?

जय: मग त्यात काय गैर आहे? अहो गाणे-ऐकायला मोठ-मोठ्या घराणातले खानदानी राजे-राजवाडेही जात असतात. खरे सांगतो!!

(नीतीमत्ता ही इतर राजे-महाराजांच्या वागण्यावरून कशी काय ठरवावी? ज्या-ज्या कर्मांनी शारीरिक-वाची-मानसिक सदाचार वाढतो ते-ते कुशल कर्म!! व ज्या-ज्या कर्मांनी माझ्यातले दुर्गुण वाढतात ते ते अकुशल कर्म!  त्यामुळे अत्त-दीप  भव: स्वतःच स्वतःचे द्वीप व्हा! जसे जीवन्याच्या महासागरात जशी अनेक वादळे येतात, तेव्हा एक द्वीप हवा असतो जहाजाला आसऱ्या साठी! तो द्वीप बाहेर कुठे शोधावा? आंतरिक शांतीच आपल्याला आपला द्वीप मिळवुन देईल )

मावशी: मग आता  एवढे ही समः कि कुठले असे घराणे आहे तुझ्या गुणवान  मित्राचे?

(घराणे हे पैसे व प्रोपर्टी साठी न पाहता त्या घराण्याची सामाजिक भान, हुशारी नव विवाहित व तरूण जोडप्याला जीवनाच्या विविध टप्प्यावर मार्गदर्शन करण्याचीहातोटी /कसब कितीआहे यासाठी पाहावे. )

जय: बस मावशी कुळाचा पत्ता लागला कि लागलीच तुम्हाला कळवतो!
(जयची मावशीला खात्री द्यायची व्यवहार कुशलता बघा. खरे तर सांगितले पण कळल्यावर सांगु हे ही कबुल केले. )

मावशी: एका गोष्टीची दाद द्यावी लागेल,शंभर दुर्गुण असोत तुझ्या मित्रात; पण तुझ्या तोंडुन त्याची स्तुती च येत असते.

जय: काय करू मावशीमाझे मनच असे आहे.

अशा प्रकारे एका लघु कथे द्वारे जावेद अख्तर व सलीम खान यांनी समाजाला दिशा द्यायचा प्रयत्न केला आहे. तो मला पटला म्हणुन मी इथे मांडला, कारण्तिथुन मला सद्धर्माची काही मुल्ये हि दिसली.

कल्याण होवो!

संबोधन धम्मपथी 




















Wednesday, 26 August 2015

 आदि  मे कल्याण है, मध्य में कल्याण ।
अन्त में  कल्याण  है , प्रगती पथ निर्वाण ।।
- आचार्य सत्य नारायण गोयंका 

मानवी जीवनात माणसाची  निरनिराळी लक्ष जीवनाच्या वेगवेगळ्या टप्यावर  असतात. आणि माणसाचे लक्ष सहसा दूर असतें व त्यासाठी निरंतर प्रयत्न करावे लागतात. जो पर्यंत लक्ष भेटत नाही तो पर्यंत सुख-शांती बहुधा मिळत नाही. पण सद्धर्माच्या राजरस्त्याची गोष्ट  वेगळी आहे. कारण मनुष्य जसजसा चालायला लागतो तसातसा सुख शांतीचा स्वानुभव प्रत्येक पदोपदी घेत राहतो. जर धर्म खरा असेल तर त्या क्षणी सुख शांती मिळायला हवी. म्रुत्युनंतर मिळणारी शांतीतर  तपासता येत  नाही, मग ती बाजुला ठेवुया. 

सद्धर्माचा रस्त्यात तर फक्त तीनच गोष्टी करायच्या असतात, फक्त तीनच!!  शील,समाधि  व प्रज्ञा . जसे एखादाप्रवास करताना पहिल्यांदा प्रत्येकाला टीकिट काढावेच लागते व तेव्हाच प्रवासाला सुरुवात करता येते. त्याच प्रमाणे सद्धर्माच्या राजमार्गावर पहिले व सुरुवातीचे पाऊल म्हणजे शील-सदाचाराचा स्वीकार. कुशल काम करणार्या व्यक्ती धम्माच्या राजमार्गावर खुप लवकर प्रगती करतात. अकुशल कर्म करणार्या व्यक्तीस स्वताला शील-सदाचाराचे जीवन स्वीकारावे लागते, पंचशीलाचे काटेकोर पणे  करण्याची प्रतिद्न्याच घ्यावी लागते। पण साधक अशी प्रतिज्ञा   इतरांना दाखविण्यासाठी नाही, तर स्वताला धम्माच्या मार्गावर काही काळ तरी तपासुन व चालून पाहण्यासाठी घेतो. अकुशल कर्म करीत बैचेन झालेले मन, आचार्यांची माफी मागुन पश्चातापातुन काही (काळ का होइना) मुक्त होऊन, निर्दोष व शांत जीवनासाठी  नवी सुरुवात करते.   आता मी पांच शील नव्याने घेवून नवीन प्रयत्न करीत आहे.  नव्या जोमाने व उत्साहाने ध्यान करण्यास किंवा जीवन जगण्यास सुरुवात करते. ह्या नवीन उत्साह व जोम व अकुशल कर्माबाबत क्षमा मिळाल्यावर शांती मिळते. पंचशील पालन करीत असल्याने आता अकुशल कर्मांपासुन मनुष्य दूर गेलेला असतो. आणि त्यामुळे आता मी वाईट कर्मे करीत नाही हे जाणुन मनातील अनामिक भीतीची जागा आनंद घेतो. असे धर्मात सुरुवातीलाच कल्याण साधले जाते. 


पण मनाचा जुना  स्वभाव हा सहजा सहजी बदलत नाही. बैचेन व्हायचा व अकुशल कर्म करायचा जुना स्वभाव आपणास  नेहमी व्याकुळ करतो, खास करून शील पालन करते वेळी. मनात जसे विचारांचे वादळ नेहमीच सुरु असते. आपण काम एक करतो आणी मनात विचार दुसरा सुरु असतो. अशा वेळी साधकाला धर्माचे पूढील  पाउल शिकवितात: समाधि . जसे कधी पाण्यातील माती पाहण्यासाठी पाण्याला शांत होऊ द्यावे लागते, तसेच मनातील विविध अकुशल विचार दूर करण्यासाठी त्याला शांत  खूप गरजेचे असते. कारण आपल्या  मनाचे ओपरेशन आपल्या मनालाच करायचे असते. त्यामुळे मन जे दिशा दाखविल त्या दिशेकडे दुर्लक्ष करून, आपले लक्ष फक्त आपल्या स्वताच्या शुद्ध व नैसर्गिक श्वासकडे ठेवायला सांगितले जाते (आनापान सति   विद्या). नेहमीच विविध दिशेत भटकणार्या मनाला लगाम घालुन स्वताच्या श्वासावर  राहण्याचे शिकविले जाते. त्यामुळे विविध प्रिय-अप्रिय आणि वर्तमान व भुतकाळातील घटनांच्यामागे मागे पळणार्या मनाला शांत राहत वर्तमानकाळात म्हणजेच ह्या क्षणाचा परिपूर्ण विचार करण्यासाठी शिकविले जाते. अशाने श्वासाद्वारे केंद्रित झालेले मन खुप मानसिक शांती देते. अशा प्रकारे धर्माचे दुसरे पाउल सुद्धा खूप कल्याणकारी असते. 

पण तरी सुद्धा ही शांती कायमची नसते. कारण ध्यान करून उठले कि इतरांशी वागताना जुना क्रोधी, अहंकारी, लोभी व पश्चाताप करणारा स्वभाव कायम असतो. अशा स्वभावाची मुळे अंर्तमानात खोल खूप खोल रुजलेली असतात. त्यामूळे ती दूर करण्यासाठी साधकाला प्रज्ञा शिकविली जाते. प्रज्ञा म्हणजे प्रत्यक्ष ज्ञान, शरीर व मनाच्या क्रियाप्रक्रियांचे प्रत्यक्ष ज्ञान. तेव्हाच साधक  मुळ स्वभावाला सामोरे जातो. काय आहे माझा स्वभाव? साधकाला हे कळू लागते कि, कुठले ही अकुशल कर्म करण्यापुर्वी मला मनात  लोभ,वासना, ईर्ष्या व मत्सर किंवा क्रोध उत्पन्न करावाच लागतो, त्याशिवाय अकुशल कर्म वाणी किंवा शरीराद्वारे होत नाही. आणि ते अकुशल कर्म केल्यावर इतरांना माझ्यापासून त्रास तर  नंतर होतो, पहिल्यांदा मलाच जबरदस्त त्रास होतो. मी अत्यंत व्याकुळ व धडधडत  असतो. असे जाणल्यावर नवीन दुष्कर्म होत नाही, व जुन्या दुष्कर्माची सवय/आठवण उफाळुन आली कि मी शरीर व मनाच्या संवेदनांकडे सजगतेने व साक्षीभावाने (तटस्थपणे) व समता ठेवून (ना लोभ जागविता व ना द्वेष/क्रोध जागविता) पाहत जुन्या अकुशल आठवणींचा शरीर व मनावरचा दुष्परिणाम दूर करतो. आता अविचारांच्या आगीला नवीन जळण मिळत नाही, व जुने दुष्कर्मे साक्षी भावाने पाहत दूर होतात. हा शरीर व मनाचा खेळ दर सेकंदाला सुरु होतो व संपतो. हे उत्पन्न व नष्ट  होण्याचे ज्ञान साधकाला विपश्याने द्वारे  स्वकष्टानेच मिळते. अशा प्रकारे जुने संस्कार जे व्याकुळ बनवितात दूर झाल्याने महान व मंगल शांती मिळते. म्हणुन धर्माचे हे अंतिम पाउल ही खुप कल्याणकारी आहे याची प्रचिती साधकाला येते. कष्ट मात्र त्यालाच घ्यावे लागतात, इतर कोणी माझ्या मनाची सफाई करेल हे केवळ अशक्य आहे. 

अशा प्रकारे धर्माचे  पाउल (शील-सदाचार ), मधले पाउल (समाधि - कुशल मनाची एकाग्रता) व अंतिम पाऊल प्रज्ञा हे तिन्ही महत्वाचे व कल्याणाकडे नेणारी पाऊले आहेत. हाच तर खरा प्रगतीचा एकमेव राजपथ/राजमार्ग आहे. साधकाने ही पाऊले वाचुन व ऐकूनच समाधान न मानता स्वतः तपासून पहावी, कि खरच असे होते का? तेव्हाच तर विश्वास होईल व त्यानंतर गंभीर रीत्या साधना केल्यावर आपण खरे तर मुक्तीपथ/प्रगतीपथ  निर्वाण (कायम स्वरुपी निर्दोष जीवनाचे सुख) आपणास मिळु शकेल. 

स्पष्टीकरण : संबोधन धम्मपथी 

Saturday, 4 July 2015

शुद्ध धर्म ऐसा जगे, होवे चित्त विशुद्ध| 
बौद्ध बने या न बने, मानव बने प्रबुद्ध||
-सत्य नारायण गोयंका 

भगवंतांनी धम्म हा काही विशेष मानवी समुहासाठी बनविलेला नाही। जर  फक्त विशेष मानवी समुहासाठी असता तर तथागत महाकारुणिक कसे म्हणविले गेले असते? निसर्ग नियम तर सगळ्यांना समान लागु होतात. पण धम्माच्या ह्या वैश्विक उपयोगामुळे बौद्ध संप्रदायात किंवा एखाद्या बौद्ध व्यक्तीत स्वतः बौद्ध असल्याचा अहंकार अलगद व नकळत उत्पन्न होऊ शकतो. हा अहंकार कि आमचा भगवानसर्वात श्रेष्ठ व इतरांचे  हलके किंवा कनिष्ठ . जसे एखादे भव्य ग्रंथालय असावे त्यातील मोठे मोठे ग्रंथ पाहुन तेथील ग्रंथापल चकित व गर्विष्ठ व्हावा कि मी जिथे काम करतो, ते ग्रंथालय सर्वात मोठे व मी सर्वात मोठा ग्रंथपाल व  सर्वात मोठा . पण त्याने एकही ग्रंथ न वाचावा. पण इतर ग्रंथालयांना व त्यांच्या ग्रंथपालांना हीन लेखावे. तर आयुष्यभर त्याची अवस्था  उपयुक्त गोड तळ्याकाठी बसून त्याच्या पाण्याची स्तुती करीत जीवन घालवावे पण एकदाही पाणी चाखुन न प्यावे अशा दुर्दैवी माणसासारखी होइल. 

बुद्ध हे एक शिक्षक होते, पण म्हणुन फक्त काही बौद्ध झाल्यानेच निर्वाण मिळत नाही. मग कशाने निर्वाण मिळु शकेल?

आणि जर का निर्वाण उपयोगी असेल तर का त्याने एकच  माणुस सुखी होतो का? नाही!! ज्यास धम्मात प्रगती केल्यामुळे थोडी बहुत क्षांती मिळु लागली अशी व्यक्ती इतरांशी आनंदाने, न्यायाने,  विचार्पुर्वक व उत्साहपूर्वक वागते. त्यामुळे आपोआप आसपासच्या व्यक्तींना  होतोच. पण हे गुण नुसत्या बौद्ध झाल्यावर मिळत नसतात. 

 प्रत्येक माणुस (प्रत्येक बौद्धही) प्रत्येक घटनेला, स्वभावा प्रमाणे: अमके मला आवडते व तमुक आवडत नाही, असे म्हणत प्रिय-अप्रिय गोष्टींच्या जंजाळात अडकलेला असतो. त्यामुळे भीती, वासना, चिंता व ईर्ष्या ह्या चित्तमळांना बळी पडून  दुष्कर्म करीत जातो. ह्या गोष्टीतून वाचण्यासाठी तो,पूजा- अर्चा,व्रतवैकल्य व उपास-तापास ही करतो. का कारण कि माझे दैवत बुद्ध किंवा  राम किंवा महावीर व इतर कोणी ऐतिहासिक पुरुष यांनी माझे गुन्हे/ माफ करावेत व मला हवी असलेली शांती द्यावे, सुख द्यावे. त्यासाठी अध्यात्माची पुस्तके ही वाचतो, जप-जाप करतो, असे करून काहीकाळ शांती  नक्की मिळते . पण २-३ तास झाल्यावर पुन्हा जुना स्वभाव : त्याने असे केले व त्याने तसे नाही केले; अशा प्रकारे क्रोध व अशांती पुन्हा आपल्यावर ताबा मिळवते. इतर देवताच काय पण बौद्ध लोकांचेही बुद्धाबाबत असेच होते. कारण ते अशांती चे बीज कसे व कोण पेरते? ते रोपट्याचे वृक्ष कसे बनते? त्याची विषारी फळे कशी  देतात? व ह्या वृक्षांना कसे उखाडून फेकावे याबद्दल बुद्धाने जे शिकविले त्यापासून बौद्ध ही अनभिज्ञ  असतात. म्हणुन फक्त बौद्ध बनून सुख-क्षांती मिळत नाही. 

मग कसे मिळेल निर्वाण? बुद्ध हे खुप विनम्र महापुरुष  होते. त्यांनी निर्वाण मिळण्यासाठी माझी पुजा-अर्चा, पुतळे-चित्र, जप-जाप यांची कधीही गरज सांगितली नाही. उलट असे करून  तुम्ही निर्वाणापासुन दूर जात आहात असेच सांगितले. मनुष्य जीवनात जे काही आपण भोगतो ते कर्माचेच परिणाम आहेत. कर्म  मानसिक,शारीरिक व वाचिक असतात. मनात क्रोध आल्याशिवाय शिवी देणे अशक्य असते, तसेच मनात वासना आल्याशिवाय अनैतिक/विवाहबाह्य संबंधही अशक्य असतात. त्यामुळे मनाच्या सवयींच्या आहारी न जाता मनालाच चांगल्या सवयी लावणे हेच निर्वाणाकडे जाण्याचा एकमेव रस्ता (अष्टांगिक मार्ग) आहे. म्हणुन शील-सदाचाराने वागत, मन एकाग्र करून (समाधि), मन व शरीराचे प्रत्येक क्षण बदलते स्वरूप स्वानुभातुन जाणणे (प्रज्ञा) हा तीन अंगी धर्म शिकून घ्या, विपश्यना विद्या शिकून त्यात पारंगत व्हा. त्यासाठी विशेष कर्मकांड व संप्रदाय बदलण्याची गरज नाही. कारण हिंदु, बौद्ध व इतर संप्रदायातील माणसे ही मनाचे गुलाम झाली आहेत. 

आणि  त्यातही त्रिपिटकाचा अभ्यासकांनुसार बुद्धाने कोणालाही बौद्ध बनविलेले नाही, त्यांनीतर व्यक्तिला धार्मिक, धर्माचारी व धर्मस्थ बनविले. म्हणुन त्या वेळी जो माणुस भगवंतांला शरण गेला त्याने त्याची संस्कृती सोडलेली नाही. 

त्यामुळे असे दिसून येते कि, बुद्धाने हेच सांगितले कि बौद्ध बना अथवा नका बनू, पण सद्गुणी, प्रज्ञावान माणुस बनणे हे तुमच्यासाठी व तुमच्या प्रियजनांसाठी कल्याणकारी आहे. कारण ग्रंथ न वाचुन अहंकार जागवणारा (पण ग्रंथांची  घेणारा) ग्रंथपाल कधीही ज्ञानी बनत नाही. 

-संबोधन धम्मपथी 

















Friday, 19 June 2015

भले न मन मैला करे, तन के सारे रोग। 
पर तन रोगी हो उठे, जब मन जागे रोग॥

- आचार्य सत्य नारायण गोयंका 


स्पष्टीकरण:

व्यक्ती कितीही निरोगी असली किंवा वाटली तरी शारीरिक रोगांचा सामना करावा लागतो. नेहमीच निरोगी व मजबूत वाटणारे शरीर कमकुवत व रोगी होऊन बसते. अपेक्षित हालचाली व कामे करता येत नाहीत मग वाईट वाटुन चीडचीड ( मनाची व्याकुळता) जाणवते. पण मनुष्य लवकर हार मानीत नसतो; अमुक खाल्या-पिल्याने मला आजार झाला आहे असा शोध चालु होऊन डाक्टरांच्या सल्याने उपचार सुरु चालु होतात. आज ना उद्या मी बरा होणारसा विश्वास व आशा  वाटू लागते. कारण मन सांगत असते, कि अजून मला खुप जग बघायचे आहे व खुप काही करून दाखवायचे आहे. अशा अपेक्षा शरीरातल्या रोगाला शरीरातून जाण्यासाठी धक्के मारीत असतात. शारीरिक रोगाला दूर करण्यासाठी सकारात्मक, उत्साहवर्धक व महत्वाकांक्षी विचार सैनिकासारखे लढू लागतात.इथे मन प्रगत जरी नसले तरी लोभी मात्र असते.  अशा प्रकारे "शारिरीक" रोगावर मात करण्यासाठी "मन" (…क़ारण मनातुनच वाईट तसेच सकारात्मक, प्रेरणादायी, उत्साहवर्धक व महत्वाकांक्षी  विचार जन्म घेतात.) मदत करते. आणि शारिरीक रोगांमुळे होणारी चीडचीड ही मनावर तितकासा भयानक परिणाम करीत नाही. म्हणजे एकुणच शरीराकडून येणारे रोग/विकार मनावर हे कमी हानिकारक असतात. 

एक उदाहरण घेवू: एखादी व्यक्ती नजरचुकी मुळे पडते तेव्हा जर न ओशाळता/वैतागता शांत मनाने पाहिले तर असे दिसते कि: आपण पडलो आहोत पाचव्या पायरीवर पण घसरण्याचे किंवा पडण्याचे कारण तर पहिल्याच पायरीवर होते. पाचव्या पायरीवर तर फ्क्त सध्याची पडण्याची प्रक्रिया पुर्ण झाली; वास्तवात पडायची सुरुवात तर पहिल्या पायरीवरच असताना घसरल्यामुळेच झाली होती. अशा प्रकारचे नियमीत आत्मपरीक्षण आपल्याला सांत्वन व पुन्हा न पडण्यासाठी अत्यंत उपयोगी आहे. 

आता आपण पाहिले कि शरीर रोगी असताना मनामध्ये असलेल्या सकारात्मक उर्जेमुळे, मनावर नकारात्मक परिणाम होत नाही. पण जेव्हा मन रोगी होते तेव्हा शरीरावर नकारात्मक परिणाम व्हायला सुरुवात होते. सभोवतालच्या जगाचे वागणे-बोलणे (आठ लोकधर्म: सुख-दुख, मान-अपमान, यश-अपयश, निंदा-स्तुती/कौतुक ) आपण नेहमीच अनुभवीत असतो. त्यात आणखिन भर म्हणजे आपल्या मनातूनही आपण आपलया मनातील काल्पनिक जगातील वागणे-बोलणे आठ लोकधर्मे ("त्याने असे केले किंवा नाही केले तर? माझा अपमान केला आहे." असे वाटणे ) अशा प्रकारे आपल्या मनातील घटना व बाह्य जगातील घटना आपल्या मनाला नाराज (अपेक्षाभंग झाल्यावर) न प्रसन्न (अपेक्षापुर्ती झाल्यावर) करीत असतात. पण मनोजगात  नाराज घटनांची रेख ही प्रसन्न घटनांच्या रेखेपेक्षा खुप गहरी व क्लेषकारक असते. आणि त्यात नाराजीच्या घटना प्रसन्नतेच्या घटनांपेक्षा वारंवार घटत असतात. 

पण मनाला जेव्हा वारंवार नाराजी/अपेक्षाभंगांना सामोरे जावे लागते, तेव्हा श्वास फुलणे, हृदयाची स्पंदने वाढणे, बद्धकोश्ठता, विनाकारण थकवा, पाचन ठीक न होणे, तसेच बैचेनी मुळे झोप न येणे असे अनेको रोग वाढत जातात. हे रोग जास्त काळ राहिले कि, शरीराला इतर भयानक रोगही जडतात, हे विपश्यना ध्यानात पारंगत असणारर्या लाखो साधकांच्या स्वानुभावातुन तसेच सध्याचा मेडिकल संशोधनातूनही अनेकोवेळा सिद्ध झाले आहे. शरीरावर होणारा हा परिणाम हा खुप घटक व बहुधा कायम स्वरुपी असतो. अशा नाराज मनामुळे जीवनाच्या प्रवासात आपण पाचव्या पायरीवर पडतो (पहिले आर्य सत्य: जगात दुःख आहे) पण ध्यान करून पाहिले असता असे दिसते कि, मी पडलो आहे खरा, पण पडण्याचे कारण आठ लोकधर्मांच्या बाबतीत अविद्येमुळे मनावर झालेला परीणामक आहे. मन जागरुक, मेहनती व प्रगत नसल्यामुळे त्या  पहिल्या पायरीलाच पडण्याची प्रक्रिया सुरु झाली होती (दुसरे आर्य सत्य: दुःखाला कारण आहे.) मन एकदा का जागरुक, मेहनती व प्रगत झाले कि कारण नष्ट करता येते (तिसरे आर्य सत्य: दुःख निरोध शक्य आहे) . आणि मन सजग, मेहनती व प्रगत बनण्याचा आर्य(महान)मार्ग विपश्यनेद्वारेच प्राप्त होतो/आचरिता येतो (चौथे आर्य सत्य: दुःख मुक्तीचा मार्ग).

त्यामुळे जीवनाच्या प्रवासात आपण मन व शरीर दोन्ही जरी महत्वाचे असले तरी मन हे प्रमुख आहे, प्रधान आहे, अध्यक्ष आहे. त्यामेळे मोक्ष /निर्वाण (कायम निर्दोष जीवन) साठी शरीराला उपवास, व्रत, राख लावणे, अर्धनग्न किंवा नागडे फिरणे, अंगारे-धुपारे, कर्म-कांडांत  अडकवून (शरीराला अतिमहत्व देवून) समस्या सुटलेल्या नाहीत. कारण महत्वाचा व गंभीर परीणाम मनाचा शरीरावर होतो। शरीराच्या रोगांचा मनावर तितकासा परिणाम होत नाही. 

-संबोधन धम्मपथी 

























Saturday, 13 June 2015

धम्मिको बौद्धिक स्पर्धा : 2015

साप्ताहिक निळा प्रहार द्वारे "धम्मिको बौद्धिक स्पर्धा" आयोजित करण्यात येत आहे। विषय: "धर्म प्रसार व धर्म प्रचार यात फरक कोणता? आणि प्रभाव कोणाचा जास्त असतो धर्म प्रसाराचा कि धर्म प्रचाराचा? उदाहरणे देवुन स्पष्ट करणे आवश्यक आहे।"
पहिल्या प्रथम जाणुन घ्या धर्म म्हणजे काय? बौद्ध, हिंदु, मुस्लिम  व ईतर हे तर संप्रदाय आहेत। धर्म ह्या शब्दाला प्राचीन भारतात स्वभाव, निसर्ग व गुणधर्म म्हणायचे। धर्माचे तीनच प्रमुख अंग आहेत: शील (सदाचारी व नैतिक जीवन), समाधि ( कुशल मनाची एकाग्रता) व प्रज्ञा (शरीर व मनाच्या सवयींचे प्रत्यक्ष ज्ञान ज्याच्या अभ्यासाने प्रत्येक मनुष्याला मोक्ष/निर्वाण मिळु शकते। जसे सिद्धार्थाला मिळाला ।) ही बौद्धिक स्पर्धा ह्याच शुद्ध धर्माच्या अर्थावर अवलंबुन आहे हे कृपया ध्यानात ठेवावे।
आता शुद्ध धर्माची गरज नक्की काय व कोणाला हे ही तथागतांनी सांगितले आहे। ते म्हणतात: गृहस्था तु अमुक देव-देवतेला पुजणारा असलास, ईश्वर एक किंवा अनेक आहेत असे मानणारा असलास, आत्मा व परमात्मा एकच किंवा अनेक मानणारा असलास, ईश्वर मानणारा किंवा न मानणारा असलास तरी तुझ्या कळत-नकळत तुझ्याच मनात ईर्षा, भीती, वासना, बैचेनी, क्रोध, कुशंका, अयोग्य अविश्वास, असंयम, असहनशीलता व व्याकुळता हे अकुशल मनोविकार जागतात ना? आणि हे च विकार मग मनातुनच वाणी न शरीरावर बाहेर पडतात। ईच्छा असुनही अकुशल कर्मांवर तुमचे नियंत्रण राहत नाही।  आम्ही त्याच चंचल मनाचे डॉक्टर आहोत। तुला ज्याला पुजायचे आहे त्याचे तु पुजा-अर्चा चालु ठेव। कायम सुख किंवा दुखमुक्ती हवी असल्यास मात्र आम्ही तुला मनाला शांत व निर्दोष बनण्यास शिकवु। पण ह्या मार्गावर तुलाच चालायचे आहे। जसे व्यायाम शाळेत गेल्यावर शिक्षक तर आपल्याला फक्त शिकवतात सुर्यनमस्कार तर आपल्यालाच मारावे लागतात। धर्माचीही गोष्ट तशीच आहे।
याचा दुसरा अर्थ असा कि बुद्धाची शिकवण/धम्म हा काही फक्त बौद्धांपुरता मर्यादीत नसुन भुत,वर्तमान व भविष्याकाळातील सर्व मानवासाठी आहे। त्यामुळ बौद्धांसह इतर संप्रदायातील लोकापर्यंतही धर्म पोचायला हवा। तर मग ईतर संप्रदायांची कर्मकांडे व संस्कृतीला नावे ठेवुन कल्याणकारी बुद्धवाणीचा बौद्धजन स्वताच अपमान करतात व तिला सीमा लावतात। ह्या  बौद्धिक स्पर्धेत मात्र असे चालणार नाही। बुद्धविचार यशस्वी रीत्या कसा पोहोचेल ते पाहायचे आहे: धर्म प्रसार व धर्म प्रचाराच्या माध्यमातुन।
काही जण असेही सुचवतील कि दर रविवारी विहारात जावे, पौर्णिमा व इतर सण साजरे करावेत। पण प्रश्न  असा आहे कि हा  धर्म प्रसार आहे का धर्म प्रचारआहे। दोन्हीही असणे शक्य नाही कारण फक्त तसे केल्याने का मन पुर्णता शांत, सजग व निर्मळ होत नाही असा माझ्यासह अनेकांचा अनुभव आहे। त्यामुळे अशी उदाहरणे देताना धर्म प्रसार व धर्म प्रचाराच्या दृष्टीनेच परिपुर्ण विचार करावा।
समजा कुणी विचारले कि शिकवणे म्हणजे काय तर असे सांगावे कि: एखादी गोष्ट/ज्ञान/माहिती आपण लेखाने/वाणीने/स्वत: आचरणात आणुन/प्रसंगानुरुप(जसे बुद्धांनी किसा गौतमीला सांगितले)  समोरच्या माणसाचे वय/स्थिती/बुद्धिमत्ता पाहुन सोप्या पद्धतीत समजावुन सांगणे याला शिकवणे म्हणतात। अशा पद्धतीने धर्म प्रसार व धर्म प्रचाराची दोन्हींची व्याख्या द्यावी। तसेच बुद्धाच्या शिकवणीचा किस्सा किंवा  स्वताच्या जीवनातील एखादा शिकवणीचा किस्सा उदाहरण स्वरुपात देवुन शिकवण ह्या शब्दाचा अर्थ समजावता येईल। त्याच प्रमाणे धर्म प्रसार व धर्म प्रचारा यांचा अर्थ ह्या धम्मिको बौद्धिक स्पर्धेत तुमचे उत्तर साधारण २०० शब्दांत द्यावे ही विनंती।
आपल्या धर्म प्रसार व धर्म प्रचारात आपण कमी पडतो आहोत। जर धर्म प्रसार व धर्म प्रचाराचा बुद्ध व बाबासाहेबांना काय अर्थ सांगायचा होता हे परिपुर्ण रीत्या समजणे व समाजात धर्म प्रसार व धर्म प्रचाराबाबत तर्कसंगत व युक्तिसंगत अशी उपयुक्त माहिती देणे हे ह्या स्पर्धेचे मंगल उद्देश्य आहे। त्यामुळे सर्वांनी ही स्पर्धा यशस्वी करण्यासाठी सर्वतोपरी यथायोग्य सहकार्य करावे, विचार मांडावेत व ईतरांनाही प्रोत्साहित करावे ही नम्र विनंती।

- संबोधन धम्मपथी